Monday, March 19, 2012

ISBN : 978-93-80470-12-2 संतों काहे की बेचैनी लेखक अनवर सुहैल


संतों काहे की बेचैनी लेखक अनवर सुहैल
ISBN : 978-93-80470-12-2

अनवर जी की इन कविताओं को पढ़ना कोयला खादानों से जुड़े अंचलों और उसके जन-जीवन से दो-चार होना है। कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन, समाज, प्रकृति, मानवीय संवेदनाएं और उनके संघर्ष उनकी कविताओं में बहुत गहराई और व्यापकता से व्यक्त हुए हैं। ये कविताएं पाठक को एक नए अनुभव लोक में ले जाती और गहरे तक संवेदित करती हैं। मानसिक रूप से हम अपने-आपको उन अंचलों और वहाँ के निवासियों से जुड़ा महसूस करते हैं। फिर यह जुड़ना किसी स्थान विशेष या लोगों तक सीमित नहीं रह जाता है बल्कि समाज की तलछट में रह रहे श्रमरत मनुष्यों और उनकी पीड़ाओं से जुड़ना हो जाता है। इन कविताओं की स्थानीयता में वैश्विकता की अपील निहित है। खदानों के जीवन परिस्थितियों को लेकर इस तरह की बहुत कम कविताएं हिंदी में पढ़ने को मिलती हैं। छोटी-छोटी और सामान्य सी प्रतीत होने वाली घटनाओं में बड़े आशयों का संधान करना इन कविताओं की विशेषता है। ये कविताएं पाठक से सीधा संवाद करती हैं, इस तरह कविता में अमूर्तीकरण का प्रतिकार करती हैं। कहीं-कहीं वे अपनी बात को कहने के लिए अधिक सपाट होने के खतरे भी उठाते हैं। नाटकीयता उनकी कविताओं की ताकत है।
अनवर सुहैल कविता में संप्रेषणीयता के आग्रही रहे हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह कविता के नाम पर सपाट और शुष्क गद्य के समर्थक हों। उनका मानना है कि गद्य लेखकों की बिरादरी आज की कविता को ‘कवियों के बीच का कूट-संदेश’ सिद्ध करने पर तुली हुई है। यानी ये ऐसी कविताएं हैं जिन्हें कवि ही लिखते हैं और कवि ही उनके पाठक होते हैं। कवि और आलोचकों का एक अन्य तबका ऐसा है जो कविता को गूढ़, अबूझ, अपाठ्य, असहज और अगेय बनाने की वकालत करता है। वह प्रश्न खड़ा करते हैं कि किसी साधारण सी बात को कहने के लिए शब्दों की इस बाजीगरी को ही कविता क्यों कहा जाए? इसलिए अपनी कविताओं में वह इस सबसे बचते हैं।
लोकोन्मुखता उनकी कविता मूल स्वर है। लोकधर्मी कविता की उपेक्षा उनको हमेशा सालती रही है। इसी के चलते उन्होंने ‘संकेत ‘पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका के माध्यम से उनका प्रयास है साहित्य केन्द्रो से बाहर लिखी जा रही महत्वपूर्ण कविता को सामने लाया जाय जिसकी लगातार घोर उपेक्षा हुई है। कठिन और व्यस्तता भरी कार्य परिस्थितियों के बावजूद अनवर लिख भी रहे हैं, पढ़ भी रहे हैं और साथ ही संपादन जैसा थका देने वाला कार्य भी कर रहे हैं। यह सब कुछ वही व्यक्ति कर सकता है जिसके भीतर समाज के प्रति गहरे सरोकार समाए हुए हों। बहुत कम लोग हैं जो इतनी गंभीरता से लगे रहते हैं और दूरस्थ जनपदीय क्षेत्रों में रचनारत लोगों के साथ अपने जीवंत संबंध बनाए रखते हैं।
पेशे से माइनिंग इंजीनियर अनवर सुहैल केवल कविता में ही नहीं बल्कि कथा के क्षेत्र में भी समान रूप से सक्रिय रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व राजकमल प्रकाशन से उनका ‘पहचान’ नाम से एक उपन्यास आया है। जो काफी चर्चित रहा है। इस उपन्यास के केंद्र में भी समाज के तलछट में रहने वाले लोगों का जीवन है जो जीवन भर अपनी पहचान पाने के लिए छटपटाते रहते हैं। विशेषकर उन लोगों का जो धार्मिक अल्पसंख्यक होने के चलते अपनी पहचान को छुपाते भी हैं और छुपा भी नहीं पाते हैं। यह कसमकस इस उपन्यास में सिद्दत से व्यक्त हुई है।
बकौल महेश
मूल्‍य -125 रूपये

Sunday, March 18, 2012

कविता का आंचल लेखक गुरिंदर सिंह कलसी


ISBN : 978-93-80470-09-2


गुरिन्दर सिंह कलसी का यह संग्रह अपने आसपास के परिवेश से आलोकित अनुभवों को कविता में अखेरता है।

         इसमें प्रणय की छवियाँ और निर्मल क्षणों के अलावा प्रकृति के दीप्त चित्र भी अंकित हैं। मानवीय संबंधों की उष्मा के लिए भी इस संग्रह की कविताएँ ‘अचानक’, ‘अच्छा लगना’, ‘इंतज़ार’, ‘उम्मीद’ और ‘जन्म’ विशेष उल्लेखनीय हैं।
         कलसी एक संभावनाशील कवि हैं और भाषा को बरतने के हुनर में हैं। उनकी कविता का फांर्म सुगढ़ता से अपना आकार गृहण कर रहा है। शब्दों के प्रति उनमें राग है और मितव्ययी स्वभाव के कारण वे न अतिरिक्त बोलते हैं न शब्दों की फिजूलख़र्ची करते हैं।
        कलसी की कविताओं को पढ़ना इस अर्थ में सुखद है कि वहाँ हमारी सुपरिचित जि़दगी के भुलाए जा चुके पते, ठिकाने, प्रसंग और संदर्भ है। मैं उनकी बेहतर कविताओं की प्रतीक्षा में रहूंगा।
लीलाधर मंडलोई

मूल्‍य 125/- रूपये

ISBN : 978-93-80470-11-5 चंदावती (अवधी उपन्‍यास) लेखक भारतेन्‍दु मिश्र

चंदावती लेखक भारतेन्‍दु मिश्र
(अवधी समाज का नया आख्यान)
ISBN : 978-93-80470-11-5


चन्दावती उपन्यास म समाज क बदलै कै कोसिस स्त्री समाज की ओर से कीन्ह गै बा। स्त्री क सब कुछ क्षमा करै वाला औ सबके भले क खातिर अपुना काँ निछावर करै वाला रूप यहमन देखाय परथै। ई क्षमा हिंसा क खिलाफ जब तनि के खड़ी होय जाथै तौ हिंसा क हारै क परथै। नई रोसनी जौन पढी लिखी लड़कियन म आइ बा वहसे नयी पीढ़ी आपन भूमिका अच्छी तरह से निभाय सकथै औ समाज कै कुरीतियन काँ बदलै म सबका यह बदलाव की खातिर तैयार करै म सफल होय सकथै।

        यहि उपन्यास म लोकतंत्रा कै चैथा खम्भा पत्राकारिता कै महत्त्व औ ताकत उजागिर कीन गै बा। जौ पत्राकार इमानदारी के साथ आम आदमी के सुख-दुख म जुटि जायँ तौ वनकी कलम कै ताकत बहुतै कुछ बदल सकथै, ठीक कइ सकथै। मुला पत्राकारन कै समझौता परस्त सुविधालोभी रूपौ यहि म देखाय परा बा।
आदमी क कमजोरी औ अच्छाई दुनौ उपन्यास म बहुतै सहज ढंग से देखाय गै बा। राजनेतन काँ लोक लाज के भै के मारे कुछ समाज के हित म करै वाला भाव यहि उपन्यास म देखावा गै बा। आज कै नेता लोक लाजौ क तिलांजलि देत चला जाथइन, वन्है ई उपन्यास कुछ सबक दै सकथै।
     कुल मिलाय कै ई उपन्यास एक सफल उपन्यास बनिगै बा। हमार ई सुभकामना बा कि चन्दावती क कहानी गाँव गाँव म पहुँचै औ अन्याय के खिलाफ सबका जगावै, सबके मन म स्त्री क अधिकार खातिर चेतावै। ई कहानी कस्बा, सहरौ म पहुँचै औ अपने पद औ हैसियत म मगरूर नेतन औ अफसरन का ई सोचै पै मजबूर कइ देय कि वै केतना सही हइन औ केतना गलत। वन्है ई याद देवावै कि तोहरे हाथे म ताकत या कलम यहि बरे दीनि गै बा कि तूँ जनता क सेवा करा।
     भाई भारतेन्दु मिश्र कै ई अवधी उपन्यास एक बड़े अभाव कै पूर्ति करै वाला है। वै ई उपन्यास लिखि कै एक लीक बनाइन है जौने से अवधी म लिखै वाले अवधीभासी प्रेरणा पाय सकथिन। बहुतै-बहुतै बधाई। भगवान श्रीराम से इहै प्रार्थना बाटै कि भारतेन्दु जी कै कलम दिनौ दिन ताकत पावत जाय, बढ़त जाय औ सबके बीचै म सराही जाय।

डां विद्याविन्दु सिंह
मूल्‍य 250/- रूपये

Sunday, November 27, 2011

Thursday, June 2, 2011

Vah Stree Likh Rahi Hai By Sundeep Awasthi

ISBN :  978-93-80470-06-1
वह स्‍त्री लिख रही है लेखक संदीप अवस्‍थी
                             
आज के प्यार में न तो सहज पवित्राता है। न उच्च नैतिक बोध फिर भी ऐसे लोग हैं जो इसके नैतिक मूल्य को बनाये हैं। संदीप ने मृत्यु पर भी अनेक कविताएँ लिखी हैं। इन कविताओं में हमारे समय के नैतिक पतन का गहरा एहसास बार-बार सजग करता है। आज की कविता में किसान तथा गाँव जीवन के चित्रा विरल हैं। पर संदीप ने उधर ध्यान दिया है। ऐसी जगह उनकी कविता का स्वर एकदम अलग तथा ताजा लगता है ‘कार्यशाला’ कविताओं में उन्होंने उन लेखक लेखिकाओं पर सहज व्यंग्य किया है जो किसान तथा ग्राम जीवन को देखे, जाने बिना दिल्ली जैसे महानगरों के सज-धजे कमरों में बैठकर कविताएँ लिखते हैं। प्रकाशन पाते हैं। पुरस्कृत होते है। इन दोनांे कविताओं में संकेत है कि बिना कुलीन मानसिकता छोड़े किसान जीवन को नहीं समझा जा सकता। उनके कठिनश्रम तथा अभावों से हमें एकात्म होना पड़ेगा। संदीप आज के महानगरवासी कवियों को संबोधित कर कहते हैंµ
लेखिकाएँ देख रही हैं श्रम की कविता धरती पर/पसीने की स्याही से लिखती महिलाओं को.../बंजर धरती पर हाड़-तोड़ मेहनत, खुदाई/निराई, हल जोतते देखते हमारे साथी।
देखो गांव की हमारी बहनें जा रही हैं सिर पर रख कर/तगारियों में खुदी खरपतवार, मिट्टी, पत्थर फैंकने।
‘कार्यशाला’ कविता में कवि ने लेखक लेखिकाओं को गाँव में तीन दिवसीय कार्यशाला रखने का सुझाव देकर गांव के जीवन के चित्रा दिये है। अंत में कवि का प्रस्ताव हैµ
”निश्चय किया सभी मित्रों ने कि/आलोचक, लेखक हल चलायेंगे/लेखिकायें करेंगी गांव की स्त्रिायों की संगत/रसोई, खेत और पानी भरने के अंदर/एक नई कविता आज लिखी/और बांची जा रही है।“
मुझे इन कविताओं में सबसे सशक्त पक्ष लगता है कविता को सर्वहारा के कठिन श्रम से जोड़कर उसे नई उ$ंचाइयों पर ले जाना। यह बात आज की कविता में विरल है।
संदीप में राजनीतिक चेतना के सहज स्फुलिंग जहां तहां दिखते हैं। वे आज के लोकतंत्रा में उन नैतिक मूल्यों की कद्र करते है जो एक सुंदर समाज बनाने के लिये बहुत जरूरी है। वह चरम वाम पंथ का प्रतिरोध करते हैं। नक्सलवाद पर इस संग्रह की तीन चार कविताएँ मूल्यवान है। इक्कीसवीं सदी में दिशाहीन हिंसा, अराजकता, लूटमार, जोर-जबरदस्ती, अपहरण, अबोध आदिवासियों की क्रूर हत्यायें हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। अबोधों को मार कर तथा औद्योगिक विकास को रोक कर कोई क्रांति सम्भव नहीं। क्रांति एक सुसंबद्ध विज्ञान है। उसका एक वैज्ञानिक दर्शन है। नक्सलवादी अराजकता से तो पूंजीकेन्द्रित समाज ही सुदृढ़ होता है। खासतौर से उस समय जब हमारा देश बड़ी कठिनाइयों का सामना कर रहा हो। इससे कोई भी राष्ट्र संगठित नहीं होता। वह बँटता, बिखरता है। दूसरे, हमारे नवयुवक दिग्भ्रमित होकर मारे जा रहे हैं। जीवन बहुत मूल्यवान होता है। इस तरह उसे नष्ट करना उचित नहीं। महान चिंतक लेनिन ने ऐसे चरमवाम को ‘बचकाना उग्रवाद कहा है।’ इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत को इससे बहुत बड़ा खतरा है। कवि ने इस ओर हमारा ध्यान खींचा हैµ
मेरे भाई, जो उठा रहे हो हथियार/बहा रहे हो खून, कर रहे हो धमाके/उससे क्या करना चाहते हो हासिल।
बच्चों की जान लेते-लेते/हो जाओगे खत्म अपने ही खून में।
अच्छी बात यह है कि संदीप सिर्फ समस्या ही खड़ी नहीं करते, बल्कि लोकतांत्रिक विकल्प भी सुझाते हैं। हमने अंग्रेजों के विरुद्ध मुक्तिसंग्राम लड़ा है। गांधी जी ने हमें अहिंसा का रास्ता दिखाया है। माओ ने, जहां तक, मैंने पढ़ा है ऐसे खून-खराबे को कभी अपने दर्शन में जगह नहीं दी। यदि भारतीय जनशक्ति संगठित होकर आवाज उठाती है तो बुनियादी परिवर्तन होके रहेगा। हमंे इस संदर्भ में विश्व में हुये बड़े राजनीतिक परिवर्तो से सबक लेना जरूरी है। इन कविताओं का स्वर बहुत गंभीर है। संकेत बड़े सटीक। आज के कवि को ऐसे मसलों पर बोलना बहुत जरूरी है।
संदीप कविता और कवि कर्म के प्रति बहुत सजग है। आस्थावान भी। एक कविता हैµअभागा। कविता में इसके दो अर्थ हैं। एक तो भाग्यहीन। दूसरा, जो अपने पथ से कभी विचलित नहीं होता। आजकल सार्थक को निरर्थक तथा निरर्थक को सार्थक बनाने का खेल बड़े पैमाने पर खेला जा रहा है। यह जीवन के हर क्षेत्रा में हैं। साहित्य में सबसे ज्यादा। इस कविता में ध्वनि है कि एक कर्मनिष्ट व्यक्ति की आस्था अडिग होती है। उसे अपने काम की स्वीकृत मिले न मिले। वह उसकी चिंता नहीं करता। एक समय आता है वह समाज में अकेला होता है। कविता की पंक्तियां हैµ
अभागा, अभागा, अभागा/जो करे कठिन काम/कड़ी मेहनत, परिश्रम/और योग्यता के बाद भी/कोई न कहे दो शब्द/फिर भीµ/वह जाता है अपनी धुन में/कई बार दिखता है हमको/है साधारण सा/मामूली सा/संघर्षो के पथ पर अकेला/कोई नहीं है उसके साथ। ऐसे ही कर्म-वीर किसी भी क्षेत्रा में उ$ंचाइयों छूते दिखते हैं। वे अपना पथ स्वयं बनाते हैं। बाद में सामान्य लोग उसका अनुभव भी करते हैं। इन कविताओं की बड़ी ताकत है कविता को श्रम से जोड़ना। यह बड़ा सरोकार संदीप की कविता में बार-बार व्यक्त हुआ हैµ
‘कवि’ कविता की पंक्तियां हैµवो जो दूर सड़क पर खींच रहा है/लदा हुआ ठेला/बहा रहा पसीना और लगा रहा जोर/वह कह रहा है/श्रम की कविता। यहां निराला की एक प्रसिद्ध कविता याद आती हैµमानव जहां बैल घोड़ा है/कैसा तन मन को जोड़ा है।
इसी तरह नागार्जुन की कविता है रिक्शा चालक परµ
खुद गये/दूधिया निगाहों में/फटी बिबाइयों वाले खुरदरे पैर/धंस गये/कुसुम-कोमल मन में/गुट्ठल घट्ठों वाले पैर/दे रहे थे गति/रबड़-विहीन ठूंठ पैडलों को/चला रहे थे/एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्र...।
श्रम-सौंदर्य प्रेरित संदीप की ये कविताएँ हिंदी की इसी मुख्यधारा की कविताएँ हैं। संदीप की एक और कविता हैµ‘देखता रहता हूँ’
थके कदमों से/धीरे-धीरे मेरी गली के सिरे पर/कचरे के ढेर में/न जाने क्या ढूंढते रहे हैं उसके हाथ/मां बच्चा ढूंढ रहे हैं/अपना सहारा उस बदबू के ढेर में/उसका भी कोई भविष्य है/मैं देखता हूं उसे/छोटा पाता हूं/अपने को।
किसी कवि को तथा इन्सान को भी मानवीय की यह उच्चतम सीमा है। इसी तरह ‘हम नहीं लिखते कविता’ में संदीप फिर श्रम से कविता को जोड़ते हैंµ
हाथ ही कविता लिखते हैं/हाथ ही रसोई बनाते हैंµयानि कविता कठिन श्रम से उपजती है।
लेकिन जीवन में हमारे ज्यों-ज्यों सुख सुविधाएँ बढ़ती हैं, हम उसके स्वाद में अधिक लिप्त होते हैं। पर उसी अनुपात में कविता में सहजता, सरसता तथा संप्रेषणीयता गायब होती जाती है। महत्वपूर्ण बात है कवि यहाँ कविता को कवि के आचरण से जोड़कर देखता है। संकेत है जैसी कविता हम रच पाते हैं वैसा जीवन में भी चरितार्थ करके दिखायें। यह बड़ी बात है जिससे आज के बड़े-बड़े कवि कतराते हैं। उनके अनुसार कवि का जीवन और कविता को मिलाकर देखना उचित नहीं। इस तरह कवि स्वैरता के लिये भारी छूट लेकर जीवन के नैतिक मूल्यों को एक तरफ ढकेल देता है।
संदीप की कविताओं के विषय विविध है। उनका अनुभव बहुरंगीय है। उन्होंने अविवाहित स्त्रिायों तथा नेत्राहीनों जैसे विरल विषयों पर कविताएँ लिखी हैं। यहाँ जीवन की विडंबनाएँ और मार्मिक त्रासदियां व्यक्त हुई हैं। इस विविधता से इन कविताओं का फलक चैड़ा हुआ है। सर्वहारा के पक्षधर कवि को जीवन के समग्र पहलुओं को दिखाना ही उचित है। संदीप की भाषा बहुत सहज है। कहीं कोई न तो शब्द चमत्कार है न कृत्रिम दुरूहता। कविता जैसे हमसे संवाद कर रही हो। कवि पृष्ठभूमि में तटस्थ बैठा इस संसार की महामाया का नाटक देखता हो।     

मूल्‍य - 200/-                            
                             
                                   
                                       

Abhi Ummeed Baki Hai by Sundeep Awasthi

ISBN : 978-93-80470-05-4
अभी उम्‍मीद बाकी है लेखक संदीप अवस्‍थी

अधिकांश कहानियां घटना प्रधान या भावना और विचार प्रधान होती हैं। घटना प्रधान कहानी दीर्घजीवी नहीं होती लेकिन उसे पढ़कर आत्मसात करने वाले पाठकों की संख्या अधिक होती है। भावना और विचार का समावेश कहानी की उम्र लम्बी करने के साथ पढ़ने वालों की विकास यात्रा में सहायक बनता है। पात्रों और परिस्थितियों, वेश और परिवेश, दिल और दिमाग के साथ रखते हुए संतुलित बलाघात के माध्यम से किया गया कहानी लेखन बहुधा कालजीवी सिद्ध होता है। लेखक की अपनी तैयारी कहानी की दिशा तय करने के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक तत्व है। पाठक ने रचना को समय गुजारने के लिये पढ़ा है या पढ़ा हुआ उसमें आये परिवर्तन का कारण बना है, लेखन की सार्थकता की यह सबसे बड़ी कसौटी है।
डा. संदीप अवस्थी के कहानी संग्रह ‘अभी उम्मीद बाकी है’ में शामिल सभी सोलह कहानियाँ वैचारिक परिपक्वता का प्रतिफल हैं। घटना प्रधान होते हुए भी भावना व विचार को साथ रखकर कहानी का गठन किया गया है। दिल का पलड़ा भारी रहने के बावजूद संग्रह की प्रत्येक कहानी एक तेवर को साथ लेकर चलती है। पठन, अध्यवसाय व चिन्तन के साथ चर्चाओं के माध्यम से मंथन करते हुए डा. संदीप ने जो मुकाम हासिल किया है, उसी का नतीजा है कि उनकी कहानियाँ पाठक में निरंतर कुछ न कुछ जोड़ती है। मनोरंजन के लिये पढ़ी गई कहानियाँ भी शनैः-शनैः पैठ बनाती हुई पाठक के चिन्तन को, उसके सोच व संस्कार को उद्वेलन की राह से कदम-दर-कदम आगे बढ़ाते हुए परिवर्तनकामी की भूमिका में लाकर खड़ा कर देती हैं।
‘सरहद के पार’ में सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी व्यापार की, ‘वायवा’ में पी-एच.डी. के दौरान सम्पूर्ण प्रक्रिया की, ‘इमोशनल अत्याचार’ में सम्बन्धों की ईमानदारी परखने के लिये स्टिंग आपरेशन की, ‘मुझसे बुरा न कोय’ में साहित्य जगत की अन्तर्कथा को उजागर करते हुए डाॅ. संदीप अपनी कहानियों से पाठक के लिए वे द्वार और खिड़कियाँ खोलते हैं, जिन तक पहुंचने की चेष्टा कम लेखकों ने की है। जानकारी के नये सूत्रों के साथ वे सड़ांध मारते व्यवस्था के हिस्सों का मुकाबला करने के लिये भी सचेत करते हैं।
‘अभी उम्मीद बाकी है’ और ‘मेरे सीने में आग जलती है’ आतंकवाद की समस्या को भिन्न नजरिये से देखने की चेष्टा करती है। ‘गंगा स्नान’, ‘दिल तो बच्चा है जी’ और ‘संगुफन’ अलग-अलग कथ्यों को लेकर लिखी गई हैं। ये कहानियां समस्या को मनोवैज्ञानिक परिणति प्रदान करती हैं और इस अर्थ में मानव मन केा समझकर उसे सकारात्मक दिशा देने की सार्थक कोशिश हैं। दलित चेतना बनाम दलितों के लिये बने कानूनों के अनुचित प्रयोग पर आधारित कहानी ‘अथातो दलित चेतना’ सत्य के उस पक्ष को उद्घाटित करती है जिसे सामने लाने का साहस सामान्यतः कोई नहीं करता। शारीरिक उबालों में डूबी, आंखें बन्द करके भी वातावरण में रची-बसी होने का अहसास कराती स्थितियों का प्रेम के आवरण में प्रदूषण भरी हवा के सांस लेने को उहापोह चित्रित करती कहानी ”उत्तर आधुनिकतावादी प्रेम“ सांस्कृतिक टकराव का दस्तावेज है।
संग्रह की कहानियां व्यक्तिगत जीवन में व्याप्त दुख-सुख, राग-रंग, उतार-चढ़ाव और आकर्षण-विकर्षण की पृष्ठभूमि के बावजूद सीधी सामाजिक सरोकारों की प्रस्तुति हैं। केवल समस्या बयान करके, चारों ओर दिखाई देती विपरीतताओं की ओर संकेत करके, विवशता भाव प्रदर्शित करके कहानियां चुप नहीं हो जाती हैं। जूझने, संघर्ष करने और समस्या पर काबिज होने का जज्बा संग्रह की कहानियों में शब्द-दर-शब्द परिलक्षित होता है। डा संदीप की एक भी कहानी पलायन का पैगाम लेकर नहीं आती। उनकी कहानियां लड़ते-लड़ते दूर तक जाने की प्रेरणा देती हैं। घोषित करती है कि तब तक हथियार मत डालो कि जब तक समस्या पिघलकर पानी न बन जाये।
डा संदीप को साहित्य की कई मंजिलें अभी तय करनी हैं। मुझे विश्वास है कि विचार व भावपदों उनकी कहानियों में समय को साक्षी बनाता रहेगा संतुलन की जो क्षमता उनकी कहानियों में प्रखर रूप से विद्यमान है, कालान्तर में अधिक पुष्ट होकर सामने आयेगी।
मूल्‍य : 200/-

Thursday, April 21, 2011

उजाले का अंधेरा (कविता संग्रह) लेखक मुकुल सरल


ISBN : 978-93-80470-08-5
उजाले का अंधेरा लेखक मुकुल सरल

आज से लगभग चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले, जब नयी कविता के घटाटोप और अकविता की विचारशून्य अराजकता से बाहर आकर हिन्दी कविता ने अपनी पुरानी प्रतिज्ञाओं को नये सिरे से परिभाषित किया था तब से वह वादों और दायरों की गिरोहबन्दियों से निकल कर इन्हीं प्रतिज्ञाओं के बल पर अपनी परख कराती आयी है. ये प्रतिज्ञाएं क्या थीं? दमन और उत्पीड़न के खिलाफ मनुष्य के अथक संघर्ष में साझेदारी, यथास्थिति से कभी समझौता न करने का संकल्प, सत्ता और उसके प्रलोभनों से किनाराकशी और वास्तविकता को पहचानने और उसे व्यक्त करने का आत्मसंघर्ष. चूंकि हिन्दी का जन्म और विकास ही वंचितों की वाणी और दीन-दलितों की आवाज़ के तौर पर हुआ है, इसलिए हिन्दी कविता की जिन प्रतिज्ञाओं का जि़क्र ऊपर किया गया, वे अपने आप में एक कसौटी बन जाती हैं. यह ठीक है कि जैसे-जैसे हमारे देश में और विशेष रूप से हिन्दी पट्टी में सांस्कृतिक संकट बढ़ा है, साहित्यकार सनद, पुरस्कार और सत्ता के दूसरे ताम-झाम की तरफ़ आकर्षित हो कर इन प्रतिज्ञाओं से दूर गये हैं या इन प्रतिज्ञाओं को ही निरर्थक बता कर किन्हीं ‘शाश्वत’ मूल्यों की तलाश करने लगे हैं, हिन्दी कवियों का एक बड़ा तबक़ा विपथगामी हुआ है. ऐसे में मुकुल सरल जैसे कवि हमें ढाढ़स बंधाते हैं कि साठ के दशक के अन्त में और नक्सलबाड़ी के महान उभार से जो चेतना जन्मी थी, जिसने हमें अपनी पुरानी जुझारू परम्परा से जोड़कर हमें ऊपर बतायी गयी प्रतिज्ञाओं को फिर से अपने घोषणा-पत्रा के रूप में सामने रखने की सलाहियत दी थी, वह ग़लत नहीं थी. 
      अन्त में इतना ज़रूर कहना चाहता हूं कि यह मुकुल सरल का पहला कविता संग्रह है. इसमें अभी कुछ अनगढ़ता भी नज़र आ सकती है. इतना ही नहीं, सभी नये लिखने वालों की तरह वे अभी कई तरह के सुरों को आज़मा कर अपना ख़ास अन्दाज़ हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं. हमें उम्मीद करनी चाहिये कि वे अपनी ‘करत’ से इस सुर को साधने में सफल होंगे और उनकी पहली-पहली कविताओं से जो आशाएं बंधती हैं उन्हें अगले मुक़ाम तक पहुंचायेंगे. -नीलाभ
मूल्‍य - 190/- रूपये