Thursday, June 2, 2011

Abhi Ummeed Baki Hai by Sundeep Awasthi

ISBN : 978-93-80470-05-4
अभी उम्‍मीद बाकी है लेखक संदीप अवस्‍थी

अधिकांश कहानियां घटना प्रधान या भावना और विचार प्रधान होती हैं। घटना प्रधान कहानी दीर्घजीवी नहीं होती लेकिन उसे पढ़कर आत्मसात करने वाले पाठकों की संख्या अधिक होती है। भावना और विचार का समावेश कहानी की उम्र लम्बी करने के साथ पढ़ने वालों की विकास यात्रा में सहायक बनता है। पात्रों और परिस्थितियों, वेश और परिवेश, दिल और दिमाग के साथ रखते हुए संतुलित बलाघात के माध्यम से किया गया कहानी लेखन बहुधा कालजीवी सिद्ध होता है। लेखक की अपनी तैयारी कहानी की दिशा तय करने के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक तत्व है। पाठक ने रचना को समय गुजारने के लिये पढ़ा है या पढ़ा हुआ उसमें आये परिवर्तन का कारण बना है, लेखन की सार्थकता की यह सबसे बड़ी कसौटी है।
डा. संदीप अवस्थी के कहानी संग्रह ‘अभी उम्मीद बाकी है’ में शामिल सभी सोलह कहानियाँ वैचारिक परिपक्वता का प्रतिफल हैं। घटना प्रधान होते हुए भी भावना व विचार को साथ रखकर कहानी का गठन किया गया है। दिल का पलड़ा भारी रहने के बावजूद संग्रह की प्रत्येक कहानी एक तेवर को साथ लेकर चलती है। पठन, अध्यवसाय व चिन्तन के साथ चर्चाओं के माध्यम से मंथन करते हुए डा. संदीप ने जो मुकाम हासिल किया है, उसी का नतीजा है कि उनकी कहानियाँ पाठक में निरंतर कुछ न कुछ जोड़ती है। मनोरंजन के लिये पढ़ी गई कहानियाँ भी शनैः-शनैः पैठ बनाती हुई पाठक के चिन्तन को, उसके सोच व संस्कार को उद्वेलन की राह से कदम-दर-कदम आगे बढ़ाते हुए परिवर्तनकामी की भूमिका में लाकर खड़ा कर देती हैं।
‘सरहद के पार’ में सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी व्यापार की, ‘वायवा’ में पी-एच.डी. के दौरान सम्पूर्ण प्रक्रिया की, ‘इमोशनल अत्याचार’ में सम्बन्धों की ईमानदारी परखने के लिये स्टिंग आपरेशन की, ‘मुझसे बुरा न कोय’ में साहित्य जगत की अन्तर्कथा को उजागर करते हुए डाॅ. संदीप अपनी कहानियों से पाठक के लिए वे द्वार और खिड़कियाँ खोलते हैं, जिन तक पहुंचने की चेष्टा कम लेखकों ने की है। जानकारी के नये सूत्रों के साथ वे सड़ांध मारते व्यवस्था के हिस्सों का मुकाबला करने के लिये भी सचेत करते हैं।
‘अभी उम्मीद बाकी है’ और ‘मेरे सीने में आग जलती है’ आतंकवाद की समस्या को भिन्न नजरिये से देखने की चेष्टा करती है। ‘गंगा स्नान’, ‘दिल तो बच्चा है जी’ और ‘संगुफन’ अलग-अलग कथ्यों को लेकर लिखी गई हैं। ये कहानियां समस्या को मनोवैज्ञानिक परिणति प्रदान करती हैं और इस अर्थ में मानव मन केा समझकर उसे सकारात्मक दिशा देने की सार्थक कोशिश हैं। दलित चेतना बनाम दलितों के लिये बने कानूनों के अनुचित प्रयोग पर आधारित कहानी ‘अथातो दलित चेतना’ सत्य के उस पक्ष को उद्घाटित करती है जिसे सामने लाने का साहस सामान्यतः कोई नहीं करता। शारीरिक उबालों में डूबी, आंखें बन्द करके भी वातावरण में रची-बसी होने का अहसास कराती स्थितियों का प्रेम के आवरण में प्रदूषण भरी हवा के सांस लेने को उहापोह चित्रित करती कहानी ”उत्तर आधुनिकतावादी प्रेम“ सांस्कृतिक टकराव का दस्तावेज है।
संग्रह की कहानियां व्यक्तिगत जीवन में व्याप्त दुख-सुख, राग-रंग, उतार-चढ़ाव और आकर्षण-विकर्षण की पृष्ठभूमि के बावजूद सीधी सामाजिक सरोकारों की प्रस्तुति हैं। केवल समस्या बयान करके, चारों ओर दिखाई देती विपरीतताओं की ओर संकेत करके, विवशता भाव प्रदर्शित करके कहानियां चुप नहीं हो जाती हैं। जूझने, संघर्ष करने और समस्या पर काबिज होने का जज्बा संग्रह की कहानियों में शब्द-दर-शब्द परिलक्षित होता है। डा संदीप की एक भी कहानी पलायन का पैगाम लेकर नहीं आती। उनकी कहानियां लड़ते-लड़ते दूर तक जाने की प्रेरणा देती हैं। घोषित करती है कि तब तक हथियार मत डालो कि जब तक समस्या पिघलकर पानी न बन जाये।
डा संदीप को साहित्य की कई मंजिलें अभी तय करनी हैं। मुझे विश्वास है कि विचार व भावपदों उनकी कहानियों में समय को साक्षी बनाता रहेगा संतुलन की जो क्षमता उनकी कहानियों में प्रखर रूप से विद्यमान है, कालान्तर में अधिक पुष्ट होकर सामने आयेगी।
मूल्‍य : 200/-

Thursday, April 21, 2011

उजाले का अंधेरा (कविता संग्रह) लेखक मुकुल सरल


ISBN : 978-93-80470-08-5
उजाले का अंधेरा लेखक मुकुल सरल

आज से लगभग चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले, जब नयी कविता के घटाटोप और अकविता की विचारशून्य अराजकता से बाहर आकर हिन्दी कविता ने अपनी पुरानी प्रतिज्ञाओं को नये सिरे से परिभाषित किया था तब से वह वादों और दायरों की गिरोहबन्दियों से निकल कर इन्हीं प्रतिज्ञाओं के बल पर अपनी परख कराती आयी है. ये प्रतिज्ञाएं क्या थीं? दमन और उत्पीड़न के खिलाफ मनुष्य के अथक संघर्ष में साझेदारी, यथास्थिति से कभी समझौता न करने का संकल्प, सत्ता और उसके प्रलोभनों से किनाराकशी और वास्तविकता को पहचानने और उसे व्यक्त करने का आत्मसंघर्ष. चूंकि हिन्दी का जन्म और विकास ही वंचितों की वाणी और दीन-दलितों की आवाज़ के तौर पर हुआ है, इसलिए हिन्दी कविता की जिन प्रतिज्ञाओं का जि़क्र ऊपर किया गया, वे अपने आप में एक कसौटी बन जाती हैं. यह ठीक है कि जैसे-जैसे हमारे देश में और विशेष रूप से हिन्दी पट्टी में सांस्कृतिक संकट बढ़ा है, साहित्यकार सनद, पुरस्कार और सत्ता के दूसरे ताम-झाम की तरफ़ आकर्षित हो कर इन प्रतिज्ञाओं से दूर गये हैं या इन प्रतिज्ञाओं को ही निरर्थक बता कर किन्हीं ‘शाश्वत’ मूल्यों की तलाश करने लगे हैं, हिन्दी कवियों का एक बड़ा तबक़ा विपथगामी हुआ है. ऐसे में मुकुल सरल जैसे कवि हमें ढाढ़स बंधाते हैं कि साठ के दशक के अन्त में और नक्सलबाड़ी के महान उभार से जो चेतना जन्मी थी, जिसने हमें अपनी पुरानी जुझारू परम्परा से जोड़कर हमें ऊपर बतायी गयी प्रतिज्ञाओं को फिर से अपने घोषणा-पत्रा के रूप में सामने रखने की सलाहियत दी थी, वह ग़लत नहीं थी. 
      अन्त में इतना ज़रूर कहना चाहता हूं कि यह मुकुल सरल का पहला कविता संग्रह है. इसमें अभी कुछ अनगढ़ता भी नज़र आ सकती है. इतना ही नहीं, सभी नये लिखने वालों की तरह वे अभी कई तरह के सुरों को आज़मा कर अपना ख़ास अन्दाज़ हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं. हमें उम्मीद करनी चाहिये कि वे अपनी ‘करत’ से इस सुर को साधने में सफल होंगे और उनकी पहली-पहली कविताओं से जो आशाएं बंधती हैं उन्हें अगले मुक़ाम तक पहुंचायेंगे. -नीलाभ
मूल्‍य - 190/- रूपये

Tuesday, March 15, 2011

बतकही


ISBN : 978-93-80470-07-8 
बतकही सम्‍पादक भारतेन्‍दु मिश्र

डीयरपार्क दिलशाद गार्डन मे दि.16-2-11 को हिन्दी के जाने माने आलोचक और वरिष्ठ साहित्यकार डाँ.विश्वनाथ त्रिपाठी का 80वाँ जन्मदिन मनाया गया। पार्क के खुले आँगन मे जहाँ वे रोज सुबह सैर करते हैं वहीं के कुछ लेखक और पत्रकार मित्रो के सहयोग से यह समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर डीयरपार्क के मित्रो के सहयोग से प्रकाशित बतकही शीर्षक पुस्तक का उन्हे समर्पण किया गया। इस पुस्तक का सम्पादन भारतेन्दु मिश्र ने किया। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा- मै यहाँ बीस वर्षो से आ रहा हूँ ,यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसीलिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नही हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है।कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है।
समारोह का संचालन लखनऊ से पधारे डियरपार्क के पुराने साथी और पत्रकार विभांशु दिव्याल ने किया। संचालन करते हुए उन्होने - बतकही को साहित्य मे अपनी तरह की पहली किताब बताया जिसमे साहित्यकारो की गप्प को लिपिबद्ध किया गया है। इस अवसर पर अन्य वक्ताओ मे बलराम अग्रवाल, अशोक गुजराती, भारतेन्दु मिश्र, रमेश प्रजापति, जयकृष्ण सिंह आदि ने त्रिपाठी जी को स्वस्थ और दीर्घायु होने की शुभकामनाएँ दीं। इसके साथ ही समारोह मे सुश्री काजल पाण्डेय, हरिनारायण, रमेश आजाद, अंगद तिवारी, राम कुमार कृषक, जयशंकर शुक्ल, वरिष्ठ नागरिक अवतार सिंह सहित अनेक मित्रो ने भाग लिया।
पुस्‍तक का मूल्‍य - 125 रूपये

Wednesday, November 17, 2010

दूर होते रिश्‍ते लेखक राजेन्‍द्र परदेसी

ISBN : 978-93-80470-04-7

दूर होते रिश्‍ते
लेखक राजेन्‍द्र परदेसी

आधुनिक समाज में विघटनवादी प्रव़तियों का प्रापल्‍य है  परिणामतः रिश्‍तें जो समाज को जोडे रखते हैं दूर होते जा रहे है ये सभी दूरी सभी रिश्‍तों में होती जा रही है पिता-पुत्र, मां-बेटा, पति-पत्‍नी, भाई-बहन आदि रिश्‍तों में दूरियां आधुनिकता की नियति है संपन्‍न‍  परिवार स्‍वार्थों के टकराव से विखंडित होते जा रहे है यह .त्रासदी है इसे झेलते हुए भी लोग महसूस नहीं कर पा रहे है उन्‍हें रिश्‍तों की दूरी में आनंद की ही अनुभूति प्रतीत हो रही है
       कथाकार राजेन्‍द्र परदेसी ने रिश्‍तों के बीच बढती दूरी का अनुभव बडी शिद्दत से किया है उन्‍होंने सामाजिक जीवन के इस बिखराव का अपनी कहानियों को केन्‍द्र में रखकर उन्‍हें सोददेश्‍यपरकता से सवारा है जिसकी मार्मिकता से पाठक के मन में यथार्थ का बोध होगा और वह कहानियों से प्रभावित होगा.
मूल्‍य - 150 रूपये

Sunday, September 26, 2010

कविता का समय संपादक लीलाधर मंडलोई

ISBN : 978-93-80470-03-0

कविता का समय
संपादक - लीलाधर मंडलोई

कविता की इस छोटी सी दुनिया में प्रवेश के रास्‍ते हैं लेकिन कुछ उलझे हुए हैं गांव-खेडे का कवि अक्‍सर भटक जाता है प्रकाशक ने इस प्रकाशन दायित्व से इस दुनिया को थोडा चौडा किया है और अब एक स्पेस है इस पर आते कवि हैं उनकी अपनी एक जगह होगी जहां से वे दुनिया को समझ सकेंगे उनके संघर्ष बडे होगे मुमकिन है कठिन रास्तों से बडी कविता के लिए कोई रास्ता खुले हमने तो उसके लिए एक जगह बनाई है अब यह जगह है और कवि है और रास्ता है और सबसे अच्छी लिखी जाने वाली कविता की उम्मीद....
पुस्तक का मूल्य : 200 रूपये
प्रकाशक : कश्यप पब्लिकेशन

Thursday, June 10, 2010

DEVELOPMENT OF PRIMITIVE TRIBES IN INDIA by Dr. CHANDRAKANT PURI

DEVELOPMENT OF PRIMITIVE TRIBES IN INDIA by Dr. CHANDRAKANT PURI ISBN : 978-81-905501-92
As per the 2001 Census there were 85.77 lakh tribals in Maharashtra, which is 8.85% of the total population of Maharashtra. Bhill, Gond, Gavit, Kolam, Kokru, Warli, Kokna, Andh, Malhar, koli, Thakur and Katkaris are the predominant tribes in Maharashtra which constitute 80% of the total tribal population.17 Maharashtra is one of the four states, which has the largest number of tribal population. According to the 2001 Census, the literacy in Maharashtra was 76.90% whereas the literacy among the tribals was just 45.05%. All the tribal communities in Maharashtra are economically impoverished. The main source of their livelihood is agriculture. Forty percent of the tribals cultivate land, whereas 45% of them work as agricultural laborers. Besides agriculture, another major source of their livelihood is forest products. Tribals in Maharashtra can be geographically divided into 3 areas namely, Sahyadri region, Satpuda region and Gondvan region. As per 2001 census tribal population of the Raigad district is 12.2%, which falls under the sahyadri region.

Rs. 250/-

Publisher : Kashyap Publication Adress : B-48/UG-4, Dilshad Exten-II, DLF, Ghaziabad-201005 ph: 9868778438

Wednesday, June 9, 2010

Garun Puran Rahashya

ISBN: 978-93-80470-01-6
गरुड़ पुराण रहस्य
लेखक
परम दयाल फकीर चंद जी महाराज
फकीर के धार्मिक विचारों के कई स्रोत थे जैसे हिंदू धर्म (सनातन धर्म) और राधास्वामी मत से उनकी लंबी सहबद्धता और सब से बढ़ कर सुरत शब्द योग में उनका निजी अनुभव. फकीर को राधास्वामी मत के मानवतावादी नजरिए में सहमति योग्य बहुत कुछ मिला लेकिन वे उनके नामदान के परंपरागत तरीके और भारत में प्रचलित गुरुइज़्म से असहमत थे. ऐसी धार्मिक प्रथाओं के प्रति उनकी सहनशीलता शून्य थी जिनसे गरीब, विश्वासी और भोले-भाले लोगों का शोषण होता हो. वे कबीर द्वारा चलाए गए संतमत के बुनियादी सिद्धांतों के प्रबल हिमायती थे परंतु सुरत शब्द योग की उच्चतम अवस्थाओं के अंतिम परिणाम और संतों द्वारा पोषित रहस्यवाद से उनका मोहभंग हो चुका था. बाद में उन्होंने योग-साधना को दिए जा रहे महत्व को कम किया और संतमत के मानवतावाद पर बल दिया. फकीर की इस विचार में आस्था थी कि 'सेक्स केवल संतान उत्पत्ति के लिए हो' (यहाँ वांछित संतान अभिप्रेत है). बिना संतान की इच्छा के पैदा हुई संतान को वे ख़ुद रौ संतान कहा करते थे जो देश के लिए हानिकारक है. संतान को संतान प्राप्ति के भाव से उत्पन्न करने पर वे बल देते थे. इससे मानव जाति के कष्ट कम हो सकते हैं. उनके जीवन-दर्शन के अनुसार दूसरों के और अपने कल्याण की इच्छा करना जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है. युवाओं को आंतरिक शांति के लिए उन्होंने शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करने, सदा व्यस्त रहने, अपनी आजीविका स्वयं कमाने, किसी सच्चे इंसान के मार्गदर्शन में रहने और आत्म-संयमी बनने की सलाह दी. अपने सामाजिक कर्तव्य के तौर पर उन्होंने अनुयायियों से कहा कि वे दूसरों को नीयतन कष्ट न पहुँचाएँ, बेमतलब बात करने से बचें, कड़वे शब्दों के प्रति सहनशील बनें और साथी प्राणियों की नि:स्वार्थ सेवा करें फकीर ने 'हर कीमत पर घरेलू शांति' पर विशेष बल दिया. शुभ कर्म, शुद्ध कमाई, दान (जिसमें प्रेम और कल्याण भी शामिल है) आदि जीवन के ऐसे पक्ष थे जो आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्व में शामिल थे. ये मानव मात्र के लिए आवश्यक हैं. आध्यात्मिक साधनाओं के अंतर्गत उन्होंने प्रेम, भक्ति, विश्वास, समर्पण पर ज़ोर दिया. 'स्वयं के प्रति सच्चा बनने', ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करने, सुमिरन-ध्यान करने और इस प्रकार अंत में आत्मज्ञान प्राप्त करने का तरीका उन्होंने बताया. फकीर चंद जी महाराज ने इस बात पर हमेशा बल दिया कि स्त्रियों का गुरु स्त्री को ही होना चाहिए. यह महिलाओं के सामाजिक सम्मान के लिए ज़रूरी है. फकीर ने अनुभव किया कि इन्सान चेतन तत्त्व का बुलबुला है और कि संतों का और मानव का अंतिम लक्ष्य (मंज़िले मकसूद) शांति है.