Thursday, August 13, 2015

Concepts of Nuclear Physics

ISBN : 978-93-82422-37-2 


Concepts of Nuclear Physics by swati

This book “Concepts of Nuclear Physics” is primarily intended as a textbook for Physics undergraduate students. The content of the book has been written keeping in view the revised syllabus of nuclear physics. Every effort has been made to make the treatment of the topic simple and comprehensive.
Though the book is mainly based on the newly prescribed syllabus, but for the sake of understanding and continuity of the subject relevant topics have been added. Numerous solved numerical examples have been included based on the concepts so that students may easily follow the development and derivations. 
A great care has been taken during the proof reading of the book but still there may be some misprints or errors. Readers of this book are requested to bring such omissions and errors along with their suggestions to the knowledge of the authors or the publishers. The author earnestly hope that this book will be useful to students and teachers both. Further I would like to acknowledge all publishers and authors of various books, manuals and journals which have been consulted during the preparation of this book.
Price : 200/-



Friday, March 28, 2014

Prathavi Putra by Akhilesh verma




Prathavi Putra by Akhilesh Verma

पृथ्वी, एक खूबसूरत ग्रह। सूरज के परिवार में जड़ा एक अनमोल रत्न। इसकी अनमोलता का कारण था इसकी जीवन प्रदान करने की क्षमता। पूरे सौर परिवार में पृथ्वी ही एक मात्रा ऐसा ग्रह था जिसके पास जीवन प्रदान करने की अद्भुत क्षमता थी। बहुत वर्षों पूर्व शायद इस ग्रह का निर्माण ही जीवन प्रदान करने के लिए किया गया था। उपयुक्त ताप, जल की सुलभता, प्राणवायु की उपस्थिति और अन्य सभी कारक जो जीवन प्रदान करने के लिए आवश्यक होते हैं, पृथ्वी अपने अन्दर समेटे हुए थी। परिणामस्वरूप इस अनमोल ग्रह पर जीवन रूपी वृक्ष का बीज पड़ चुका था। धीरे-धीरे यह वृक्ष बड़ा होता गया अर्थात पृथ्वी पर अनेक प्रजातियों ने जन्म ले लिया था। परन्तु जहाँ निर्माण है वहाँ विनाश भी कदम से कदम मिलाकर चलता है। वृक्ष की शाखाओं की तरह इस जीवन रूपी वृक्ष की शाखाओं का भी टूटना स्वभाविक ही था। अतः अनेक प्रजातियाँ काल के मुख में समा गयीं। फिर इस वृक्ष पर एक नयी शाखा की कोंपलें फूटने लगी। इस नयी शाखा रूपी प्रजाति का नाम था ‘मानव जाति’। वह जाति हिमयुग के पश्चात् विकास की ओर अग्रसर होने लगी। उस प्रजाति ने पृथ्वी के इतिहास को एक नया मोड दे दिया। वह जाति बहुत कुछ तेजी से सीखती गयी। आरम्भ में तो वह जंगली जानवरों की भांति जंगलों, गुफाओं, आदि में ही रही और जानवरों की भांति शिकार कर कच्चा माँस खाकर अपने पेट की अग्नि को शान्त करती रही। कालांतर में इस प्रजाति ने समूह बनाकर रहना सीख लिया और समूह को व्यवस्थित रखने के लिए नियमों का विकास किया। इन्हीं नियमों के फलस्वरूप अलग-अलग सभ्यताओं का अस्तित्व सामने आने लगा। धीरे-धीरे उस प्रजाति ने पेट की अग्नि को शान्त करने के सरल उपाय भी खोज निकाले। इसमें एक प्रमुख था कृषि। इससे उसके पेट की अग्नि को शान्ति सरलता से मिलने लग गई और एक अन्य प्रकार की अग्नि को प्रज्वलित होने का भी मौका मिल गया। वह अग्नि थी ‘ज्ञान की अग्नि’। वह इस अग्नि को........

Price : 65/-

Sunday, December 16, 2012

Sachar Ki Sifarishen by Abdur Rahman

सच्‍चर की सिफारिशें लेखक अब्‍दुर रहमान

ISBN : 978-93-82422-05-1        Price : 210.00 Rs.


मार्च 2005 में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह द्वारा सच्चर समिति का गठन किया गया था. श्री राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में गठित यह प्रधानमंत्री की एक उच्च स्तरीय समिति थी. गठन के बाद समिति ने अपना कार्य आरंभ किया तथा सभी राज्यों सरकारी विभागों और अभिलेखागारों से सूचना जमा करनी शुरु की. सूचना जमा करने के क्रम में ही देश में कुछ गतिविधियाँ महसूस की जाने लगी थीं. मुस्लिमों में यह आशा बंधने लगी थी कि उनके विकास के लिए कोई विस्तृत योजना बनाई जाएगी जिससे समुदाय का विकास होगा. सभी राज्यों तथा विभागों ने समिति को सूचना नहीं दी. कुछ ने अधूरी जानकारी दी. फिर भी कड़ी मेहनत के द्वारा समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार की और नवंबर 2006 में इसे प्रधानमंत्री को प्रस्तुत की. एक वर्ष के बाद 30 नवंबर 2007 को यह रिपोर्ट लोकसभा में पेश की गई. इस प्रकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक कर दिया गया.
        रिपोर्ट आम होने के बाद देश, विशेषकर मुस्लिम समाज में एक बढ़ी हुई गतिविधि (बेचैनी) दिख रही थी. सभा धरना प्रदर्शन आदि के द्वारा यह माँग होने लगी कि इस रिपोर्ट को पूरी तरह लागू किया जाए. कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया. परंतु एक बात ध्यान देने योग्य है कि किसी ने भी इस रिपोर्ट को पूरी तरह नहीं पढ़ी. संसद में पेश होने के बाद इसकी प्रतिलिपि केवल सांसदों (लोकसभा एवं राज्यसभा) को दी गई. यहाँ तक कि राज्यों के विधानसभा/ विधान परिषद् सदस्यों को भी इसकी प्रतिलिपि नहीं मिली है. पुस्तक के रुप में यह रिपोर्ट बाज़ार में भी उपलब्ध नहीं है. यह केवल इंटरनेट पर उपलब्ध है जहाँ आम भारतीयों की पहुँच नहीं के बराबर है. इस प्रकार यह आम जनता की नज़र से दूर है. कुछ लोगों ने इसे सरल बनाने की कोशिश की है परंतु कम पृष्ठवाली पुस्तकों में पूरी सच्चर रिपोर्ट को प्रस्तुत करना आसान नहीं है. कहीं लिखित ;जमगजद्ध सूचना का आभाव था तो कहीं आँकड़ों तथा सारणियों को प्रस्तुत नहीं किया गया था. उस समय मैंने महसूस किया कि सच्चर समिति की रिपोर्ट के आधार पर एक ऐसी पुस्तक लिखी जाए जो आसान हो; जिसमें सभी प्रकार की सूचना हो जो रिपोर्ट का अनुवाद नहीं बल्कि सरल प्रस्तुतीकरण हो और आम-फ़हम भाषा में हो. इस योजना अथवा विचार के कारण यह पुस्तक पाठकों के सामने है.
        पूर्ण रुप से मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि यह पुस्तक सच्चर रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद नहीं है. यह पुस्तक सच्चर समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का हिन्दी भाषा में सरल प्रस्तुतीकरण है. एक विशेष इरादे से यह पुस्तक राष्ट्रभाषा हिन्दी में लिखी गई है ताकि आम भारतीय जनता इसे पढ़ तथा समझ सके. इसमें सच्चर रिपोर्ट की पूरी लिखित सूचना को आसान बनाकर प्रस्तुत किया गया है. सारणियों, ग्राफ चित्रों आरेखों और रिपोर्ट की परिशिष्ट में दी गई जानकारी को सरल बनाकर पेश किया गया है. पुस्तक लिखते समय यह सावधानी बरती गई है कि पुस्तक छोटी हो आम भाषा में हो और सच्चर रिपोर्ट की छोटी-सी-छोटी जानकारी भी उसमें शामिल हो. व्यावहारिक तौर पर यह सच्चर रिपोर्ट का संपूर्ण तथा आसान सार-संक्षेप है.
        यह पुस्तक 14 अध्यायों में विभाजित है. अध्याय 1 एवं 2 और सभी परिशिष्ट लेखक द्वारा जोड़ें गए हैं. सच्चर रिपोर्ट के 12 अध्यायों को इस पुस्तक में अध्याय 3 से 14 तक प्रस्तुत किया गया है. रिपोर्ट में प्रस्तुत लिखित जानकारी को इसमें शब्दशः नहीं उतारा गया है. प्रत्येक अध्याय की आवश्यक सूचना को आसान शब्दों में पेश किया गया है. कठिन सारणी को आसान बनाना; सारणी को छोटा करना दो या उससे अधिक सारणियों को जोड़ना रिपोर्ट के परिशिष्ट की सारणियों को अध्याय में प्रस्तुत करना तथा चित्रों आरेखों और ग्राफ की जानकारी को लिखित रुप में प्रस्तुत करना इस प्रकार के अभ्यास इस पुस्तक में किए गए हैं. प्रत्येक सारणी के बाद उसका विश्लेषन आसान शब्दों में किया गया है. प्रत्येक अध्याय के अंत में उसका सारांश और सच्चर द्वारा की गई सिफ़ारिशों को अत्यंत सरल भाषा में पेश किया गया है. अनेक स्थानों पर तांत्रिक हिन्दी शब्दों को आसान बनाने के लिए उनसे मेल खानेवाले अंग्रेज़ी शब्द दिए गए हैं. अ.जा./अ.ज.जा. के लिए sc/st सामाजिक-धार्मिक समूह के लिए SRCs आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है. सारणी के शीर्षक तथा सारणी के भीतर की सूचना को अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किया गया है. सारणी के अंदर के तांत्रिक शब्दों का यदि हिन्दी अनुवाद किया जाए तो यह पाठकों के लिए कठिन हो जाएगा. केवल सारणी 12-1 तथा 14-2 को पूर्ण रुप से हिन्दी में प्रस्तुत किया गया है. प्रत्येक अध्याय में सूचना का अद्यतन करने के लिए संदर्भ-सूची में उल्लेखित पुस्तकों की सहायता ली गई है.
        पुस्तक के रचना-काल में मेरी पत्नी फ़रज़ाना बेटी अदीबा और पुत्र फ़हद ने जिस धैर्य का परिचय दिया है तथा जो सहायता एवं प्रोत्साहन मुझे दी है इसके लिए मैं इनका आभारी हूँ. सारणियों की टाइपिंग में अदीबा ने मेरी सहायता की थी. मैं उसे विशेष रुप से धन्यवाद देता हूँ. मैं अपने मित्रों का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे प्रोत्साहन दिया तथा पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया. पुणे विश्वविद्यालय के उप-कुलपति डाॅ. वासुदेव गाडे का मैं आभारी हूँ जिन्होंने पूरी पाण्डुलिपि को पढ़ा तथा पुस्तक के विषय में अपना अभिप्राय दिया है. मैं विनोद वामनराव पाटील पुलिस कांन्स्टेबल जिला-जलगाँव का अत्यंत आभारी हूँ जिसने पाण्डुलिपि की टाइपिंग उसे सुधारने और प्रिंटिंग में मेरी काफ़ी सहायता की है. पुस्तक के एडिटर दिपक पुंडेकर तथा पुस्तक लिखने में जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप में मेरी सहायता की है उनका आभार प्रकट करना मैं अपना कर्तव्य समझता हँू.
        सच्चर रिपोर्ट भारतीय मुस्लिम समाज की आर्थिक सामाजिक तथा शैक्षिक स्थिति की जाँच-रिपोर्ट है. मैंने इसे सरल तथा पढ़ने योग्य बनाने का प्रयास किया है. मुझे आशा है कि आम जनता इससे लाभान्वित होगी और मुस्लिम समाज के विकास और उन्हें मुख्यधारा में लाने के प्रयास में अपना योगदान देगी. मैं अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल रहा, इसके निर्णय का भार पाठकों पर है. पुस्तक में आई त्रुटियों की जि़म्मेदारी मेरी है. मैं पाठकों की प्रतिक्रिया, चाहे वे किसी भी रुप में हों का सदैव स्वागत करुँगा.
अब्‍दुर रहमान

Friday, August 17, 2012

Chand Se Chithi Aayee Hai by Sandeep Sharma

  ISBN : 978-93-80470-19-1

चांद से चिट्रठी आई है लेखक संदीप शर्मा

मैं अपनी बात इस लघु कथा के माध्यम से कहना चाहता हूँ। सूखे पेड़ की उंची टहनी पर एक घोंसला था, परिंदे के बच्चे घोंसले से बाहर सिर निकालना सीख चुके थे। पूरा दिन शोर और सबक सीखने में ही बीत जाता था। एक दिन आँधी आई और घोंसला डोलने लगा। अब बच्चों का चेहरा सुर्ख हो गया। उनका शोर अब कर्कश हो चुका था। डर के कारण शरीर काँप रहे थे। उन बच्चों ने अपने हाथ एक-दूसरे के हाथों में देकर होंसला बढ़ाया। कुछ समय बाद आँधी थम गई। घोंसला अपनी जगह था और बच्चे भी सुरक्षित थे। वे सहमे से झाँक रहे थे लेकिन कोई शोर नहीं था। उनकी डरी हुई आँखें कभी धीमी गति से डोलते घोंसले के छिन्न-भिन्न हो चुके तिनकों को देखतीं तो कभी उस डाल को जिस पर घोंसला लटका हुआ था। बड़े परिंदे ने चोंच से उस घोंसले की तुरपाई शुरू कर दी। परिंदे के बच्चांे का ये अंतिम सबक था जिसके पूरा होते ही वे घोंसला छोड़कर उड़ गए। जिंदगी भी कुछ इसी तरह की ही है। घोंसला तेज आँधी में भी बँधा रहा क्योंकि वह जिस डाल पर बनाया गया था वह लचीली थी और समय के साथ मुड़ना जानती थी। जितनी जिंदगी उतने ही थोड़े से सबक। अब घोंसले से उड़े परिंदे कई पेड़ों पर जा बसे, अपने-अपने घोंसले बनाए और दुनिया भी बसाई। कहानी छोटी है लेकिन जीवन का सार समेटे है। मेरे लिए कहानी शब्दों की जटिलता नहीं बल्कि मानवीयता की कोमल कसक है। घोंसले के सबसे मजबूत तिनके-सा भरोसा मैं अपने अंदर समेटे हुए हूँ, मेरे लिए हर वो घटनाक्रम कहानी है जो चरमराते दौर में समझदारी और संस्कार के बीज पनपाने की क्षमता रखता हो। मैं नहीं चाहता मेरी कहानियाँ कठिन शब्दों के पिंजरे में कैद होकर रह जाएँ, मैं चाहता हूँ कि वह श्वेत कपोत की भाँति आसमान में स्वछंद उड़ान भरती रहें। मेरी कहानियाँ मानवीय भावनाओं की अनुभूति में नहाई हुई हैं, उन्हें पढ़कर यदि आँखें आँसुओं से डबडबा उठें तो उन्हें पोंछियेगा मत क्योंकि तब मेरी कहानी आपको महसूस कर रही होगी। महसूसने का ये कालखंड साहित्य के आध्यात्म-सी शांति लिए हुए होगा। अनुग्रह है, मेरी पहली कृति आपको अपने से कुछ भावुक पल देने में सक्षम साबित हो तो मुझसे अवश्य कहियेगा। खामी हो तो उससे भी अवगत कराना न भूलें। आप मेरे अपने हैं। आपका ये सहयोग मुझे नया हौसला देगा। 

मूल्‍य - 180 /-

Monday, March 19, 2012

ISBN : 978-93-80470-12-2 संतों काहे की बेचैनी लेखक अनवर सुहैल


संतों काहे की बेचैनी लेखक अनवर सुहैल
ISBN : 978-93-80470-12-2

अनवर जी की इन कविताओं को पढ़ना कोयला खादानों से जुड़े अंचलों और उसके जन-जीवन से दो-चार होना है। कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन, समाज, प्रकृति, मानवीय संवेदनाएं और उनके संघर्ष उनकी कविताओं में बहुत गहराई और व्यापकता से व्यक्त हुए हैं। ये कविताएं पाठक को एक नए अनुभव लोक में ले जाती और गहरे तक संवेदित करती हैं। मानसिक रूप से हम अपने-आपको उन अंचलों और वहाँ के निवासियों से जुड़ा महसूस करते हैं। फिर यह जुड़ना किसी स्थान विशेष या लोगों तक सीमित नहीं रह जाता है बल्कि समाज की तलछट में रह रहे श्रमरत मनुष्यों और उनकी पीड़ाओं से जुड़ना हो जाता है। इन कविताओं की स्थानीयता में वैश्विकता की अपील निहित है। खदानों के जीवन परिस्थितियों को लेकर इस तरह की बहुत कम कविताएं हिंदी में पढ़ने को मिलती हैं। छोटी-छोटी और सामान्य सी प्रतीत होने वाली घटनाओं में बड़े आशयों का संधान करना इन कविताओं की विशेषता है। ये कविताएं पाठक से सीधा संवाद करती हैं, इस तरह कविता में अमूर्तीकरण का प्रतिकार करती हैं। कहीं-कहीं वे अपनी बात को कहने के लिए अधिक सपाट होने के खतरे भी उठाते हैं। नाटकीयता उनकी कविताओं की ताकत है।
अनवर सुहैल कविता में संप्रेषणीयता के आग्रही रहे हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह कविता के नाम पर सपाट और शुष्क गद्य के समर्थक हों। उनका मानना है कि गद्य लेखकों की बिरादरी आज की कविता को ‘कवियों के बीच का कूट-संदेश’ सिद्ध करने पर तुली हुई है। यानी ये ऐसी कविताएं हैं जिन्हें कवि ही लिखते हैं और कवि ही उनके पाठक होते हैं। कवि और आलोचकों का एक अन्य तबका ऐसा है जो कविता को गूढ़, अबूझ, अपाठ्य, असहज और अगेय बनाने की वकालत करता है। वह प्रश्न खड़ा करते हैं कि किसी साधारण सी बात को कहने के लिए शब्दों की इस बाजीगरी को ही कविता क्यों कहा जाए? इसलिए अपनी कविताओं में वह इस सबसे बचते हैं।
लोकोन्मुखता उनकी कविता मूल स्वर है। लोकधर्मी कविता की उपेक्षा उनको हमेशा सालती रही है। इसी के चलते उन्होंने ‘संकेत ‘पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका के माध्यम से उनका प्रयास है साहित्य केन्द्रो से बाहर लिखी जा रही महत्वपूर्ण कविता को सामने लाया जाय जिसकी लगातार घोर उपेक्षा हुई है। कठिन और व्यस्तता भरी कार्य परिस्थितियों के बावजूद अनवर लिख भी रहे हैं, पढ़ भी रहे हैं और साथ ही संपादन जैसा थका देने वाला कार्य भी कर रहे हैं। यह सब कुछ वही व्यक्ति कर सकता है जिसके भीतर समाज के प्रति गहरे सरोकार समाए हुए हों। बहुत कम लोग हैं जो इतनी गंभीरता से लगे रहते हैं और दूरस्थ जनपदीय क्षेत्रों में रचनारत लोगों के साथ अपने जीवंत संबंध बनाए रखते हैं।
पेशे से माइनिंग इंजीनियर अनवर सुहैल केवल कविता में ही नहीं बल्कि कथा के क्षेत्र में भी समान रूप से सक्रिय रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व राजकमल प्रकाशन से उनका ‘पहचान’ नाम से एक उपन्यास आया है। जो काफी चर्चित रहा है। इस उपन्यास के केंद्र में भी समाज के तलछट में रहने वाले लोगों का जीवन है जो जीवन भर अपनी पहचान पाने के लिए छटपटाते रहते हैं। विशेषकर उन लोगों का जो धार्मिक अल्पसंख्यक होने के चलते अपनी पहचान को छुपाते भी हैं और छुपा भी नहीं पाते हैं। यह कसमकस इस उपन्यास में सिद्दत से व्यक्त हुई है।
बकौल महेश
मूल्‍य -125 रूपये

Sunday, March 18, 2012

कविता का आंचल लेखक गुरिंदर सिंह कलसी


ISBN : 978-93-80470-09-2


गुरिन्दर सिंह कलसी का यह संग्रह अपने आसपास के परिवेश से आलोकित अनुभवों को कविता में अखेरता है।

         इसमें प्रणय की छवियाँ और निर्मल क्षणों के अलावा प्रकृति के दीप्त चित्र भी अंकित हैं। मानवीय संबंधों की उष्मा के लिए भी इस संग्रह की कविताएँ ‘अचानक’, ‘अच्छा लगना’, ‘इंतज़ार’, ‘उम्मीद’ और ‘जन्म’ विशेष उल्लेखनीय हैं।
         कलसी एक संभावनाशील कवि हैं और भाषा को बरतने के हुनर में हैं। उनकी कविता का फांर्म सुगढ़ता से अपना आकार गृहण कर रहा है। शब्दों के प्रति उनमें राग है और मितव्ययी स्वभाव के कारण वे न अतिरिक्त बोलते हैं न शब्दों की फिजूलख़र्ची करते हैं।
        कलसी की कविताओं को पढ़ना इस अर्थ में सुखद है कि वहाँ हमारी सुपरिचित जि़दगी के भुलाए जा चुके पते, ठिकाने, प्रसंग और संदर्भ है। मैं उनकी बेहतर कविताओं की प्रतीक्षा में रहूंगा।
लीलाधर मंडलोई

मूल्‍य 125/- रूपये

ISBN : 978-93-80470-11-5 चंदावती (अवधी उपन्‍यास) लेखक भारतेन्‍दु मिश्र

चंदावती लेखक भारतेन्‍दु मिश्र
(अवधी समाज का नया आख्यान)
ISBN : 978-93-80470-11-5


चन्दावती उपन्यास म समाज क बदलै कै कोसिस स्त्री समाज की ओर से कीन्ह गै बा। स्त्री क सब कुछ क्षमा करै वाला औ सबके भले क खातिर अपुना काँ निछावर करै वाला रूप यहमन देखाय परथै। ई क्षमा हिंसा क खिलाफ जब तनि के खड़ी होय जाथै तौ हिंसा क हारै क परथै। नई रोसनी जौन पढी लिखी लड़कियन म आइ बा वहसे नयी पीढ़ी आपन भूमिका अच्छी तरह से निभाय सकथै औ समाज कै कुरीतियन काँ बदलै म सबका यह बदलाव की खातिर तैयार करै म सफल होय सकथै।

        यहि उपन्यास म लोकतंत्रा कै चैथा खम्भा पत्राकारिता कै महत्त्व औ ताकत उजागिर कीन गै बा। जौ पत्राकार इमानदारी के साथ आम आदमी के सुख-दुख म जुटि जायँ तौ वनकी कलम कै ताकत बहुतै कुछ बदल सकथै, ठीक कइ सकथै। मुला पत्राकारन कै समझौता परस्त सुविधालोभी रूपौ यहि म देखाय परा बा।
आदमी क कमजोरी औ अच्छाई दुनौ उपन्यास म बहुतै सहज ढंग से देखाय गै बा। राजनेतन काँ लोक लाज के भै के मारे कुछ समाज के हित म करै वाला भाव यहि उपन्यास म देखावा गै बा। आज कै नेता लोक लाजौ क तिलांजलि देत चला जाथइन, वन्है ई उपन्यास कुछ सबक दै सकथै।
     कुल मिलाय कै ई उपन्यास एक सफल उपन्यास बनिगै बा। हमार ई सुभकामना बा कि चन्दावती क कहानी गाँव गाँव म पहुँचै औ अन्याय के खिलाफ सबका जगावै, सबके मन म स्त्री क अधिकार खातिर चेतावै। ई कहानी कस्बा, सहरौ म पहुँचै औ अपने पद औ हैसियत म मगरूर नेतन औ अफसरन का ई सोचै पै मजबूर कइ देय कि वै केतना सही हइन औ केतना गलत। वन्है ई याद देवावै कि तोहरे हाथे म ताकत या कलम यहि बरे दीनि गै बा कि तूँ जनता क सेवा करा।
     भाई भारतेन्दु मिश्र कै ई अवधी उपन्यास एक बड़े अभाव कै पूर्ति करै वाला है। वै ई उपन्यास लिखि कै एक लीक बनाइन है जौने से अवधी म लिखै वाले अवधीभासी प्रेरणा पाय सकथिन। बहुतै-बहुतै बधाई। भगवान श्रीराम से इहै प्रार्थना बाटै कि भारतेन्दु जी कै कलम दिनौ दिन ताकत पावत जाय, बढ़त जाय औ सबके बीचै म सराही जाय।

डां विद्याविन्दु सिंह
मूल्‍य 250/- रूपये

Sunday, November 27, 2011

Thursday, June 2, 2011

Vah Stree Likh Rahi Hai By Sundeep Awasthi

ISBN :  978-93-80470-06-1
वह स्‍त्री लिख रही है लेखक संदीप अवस्‍थी
                             
आज के प्यार में न तो सहज पवित्राता है। न उच्च नैतिक बोध फिर भी ऐसे लोग हैं जो इसके नैतिक मूल्य को बनाये हैं। संदीप ने मृत्यु पर भी अनेक कविताएँ लिखी हैं। इन कविताओं में हमारे समय के नैतिक पतन का गहरा एहसास बार-बार सजग करता है। आज की कविता में किसान तथा गाँव जीवन के चित्रा विरल हैं। पर संदीप ने उधर ध्यान दिया है। ऐसी जगह उनकी कविता का स्वर एकदम अलग तथा ताजा लगता है ‘कार्यशाला’ कविताओं में उन्होंने उन लेखक लेखिकाओं पर सहज व्यंग्य किया है जो किसान तथा ग्राम जीवन को देखे, जाने बिना दिल्ली जैसे महानगरों के सज-धजे कमरों में बैठकर कविताएँ लिखते हैं। प्रकाशन पाते हैं। पुरस्कृत होते है। इन दोनांे कविताओं में संकेत है कि बिना कुलीन मानसिकता छोड़े किसान जीवन को नहीं समझा जा सकता। उनके कठिनश्रम तथा अभावों से हमें एकात्म होना पड़ेगा। संदीप आज के महानगरवासी कवियों को संबोधित कर कहते हैंµ
लेखिकाएँ देख रही हैं श्रम की कविता धरती पर/पसीने की स्याही से लिखती महिलाओं को.../बंजर धरती पर हाड़-तोड़ मेहनत, खुदाई/निराई, हल जोतते देखते हमारे साथी।
देखो गांव की हमारी बहनें जा रही हैं सिर पर रख कर/तगारियों में खुदी खरपतवार, मिट्टी, पत्थर फैंकने।
‘कार्यशाला’ कविता में कवि ने लेखक लेखिकाओं को गाँव में तीन दिवसीय कार्यशाला रखने का सुझाव देकर गांव के जीवन के चित्रा दिये है। अंत में कवि का प्रस्ताव हैµ
”निश्चय किया सभी मित्रों ने कि/आलोचक, लेखक हल चलायेंगे/लेखिकायें करेंगी गांव की स्त्रिायों की संगत/रसोई, खेत और पानी भरने के अंदर/एक नई कविता आज लिखी/और बांची जा रही है।“
मुझे इन कविताओं में सबसे सशक्त पक्ष लगता है कविता को सर्वहारा के कठिन श्रम से जोड़कर उसे नई उ$ंचाइयों पर ले जाना। यह बात आज की कविता में विरल है।
संदीप में राजनीतिक चेतना के सहज स्फुलिंग जहां तहां दिखते हैं। वे आज के लोकतंत्रा में उन नैतिक मूल्यों की कद्र करते है जो एक सुंदर समाज बनाने के लिये बहुत जरूरी है। वह चरम वाम पंथ का प्रतिरोध करते हैं। नक्सलवाद पर इस संग्रह की तीन चार कविताएँ मूल्यवान है। इक्कीसवीं सदी में दिशाहीन हिंसा, अराजकता, लूटमार, जोर-जबरदस्ती, अपहरण, अबोध आदिवासियों की क्रूर हत्यायें हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। अबोधों को मार कर तथा औद्योगिक विकास को रोक कर कोई क्रांति सम्भव नहीं। क्रांति एक सुसंबद्ध विज्ञान है। उसका एक वैज्ञानिक दर्शन है। नक्सलवादी अराजकता से तो पूंजीकेन्द्रित समाज ही सुदृढ़ होता है। खासतौर से उस समय जब हमारा देश बड़ी कठिनाइयों का सामना कर रहा हो। इससे कोई भी राष्ट्र संगठित नहीं होता। वह बँटता, बिखरता है। दूसरे, हमारे नवयुवक दिग्भ्रमित होकर मारे जा रहे हैं। जीवन बहुत मूल्यवान होता है। इस तरह उसे नष्ट करना उचित नहीं। महान चिंतक लेनिन ने ऐसे चरमवाम को ‘बचकाना उग्रवाद कहा है।’ इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत को इससे बहुत बड़ा खतरा है। कवि ने इस ओर हमारा ध्यान खींचा हैµ
मेरे भाई, जो उठा रहे हो हथियार/बहा रहे हो खून, कर रहे हो धमाके/उससे क्या करना चाहते हो हासिल।
बच्चों की जान लेते-लेते/हो जाओगे खत्म अपने ही खून में।
अच्छी बात यह है कि संदीप सिर्फ समस्या ही खड़ी नहीं करते, बल्कि लोकतांत्रिक विकल्प भी सुझाते हैं। हमने अंग्रेजों के विरुद्ध मुक्तिसंग्राम लड़ा है। गांधी जी ने हमें अहिंसा का रास्ता दिखाया है। माओ ने, जहां तक, मैंने पढ़ा है ऐसे खून-खराबे को कभी अपने दर्शन में जगह नहीं दी। यदि भारतीय जनशक्ति संगठित होकर आवाज उठाती है तो बुनियादी परिवर्तन होके रहेगा। हमंे इस संदर्भ में विश्व में हुये बड़े राजनीतिक परिवर्तो से सबक लेना जरूरी है। इन कविताओं का स्वर बहुत गंभीर है। संकेत बड़े सटीक। आज के कवि को ऐसे मसलों पर बोलना बहुत जरूरी है।
संदीप कविता और कवि कर्म के प्रति बहुत सजग है। आस्थावान भी। एक कविता हैµअभागा। कविता में इसके दो अर्थ हैं। एक तो भाग्यहीन। दूसरा, जो अपने पथ से कभी विचलित नहीं होता। आजकल सार्थक को निरर्थक तथा निरर्थक को सार्थक बनाने का खेल बड़े पैमाने पर खेला जा रहा है। यह जीवन के हर क्षेत्रा में हैं। साहित्य में सबसे ज्यादा। इस कविता में ध्वनि है कि एक कर्मनिष्ट व्यक्ति की आस्था अडिग होती है। उसे अपने काम की स्वीकृत मिले न मिले। वह उसकी चिंता नहीं करता। एक समय आता है वह समाज में अकेला होता है। कविता की पंक्तियां हैµ
अभागा, अभागा, अभागा/जो करे कठिन काम/कड़ी मेहनत, परिश्रम/और योग्यता के बाद भी/कोई न कहे दो शब्द/फिर भीµ/वह जाता है अपनी धुन में/कई बार दिखता है हमको/है साधारण सा/मामूली सा/संघर्षो के पथ पर अकेला/कोई नहीं है उसके साथ। ऐसे ही कर्म-वीर किसी भी क्षेत्रा में उ$ंचाइयों छूते दिखते हैं। वे अपना पथ स्वयं बनाते हैं। बाद में सामान्य लोग उसका अनुभव भी करते हैं। इन कविताओं की बड़ी ताकत है कविता को श्रम से जोड़ना। यह बड़ा सरोकार संदीप की कविता में बार-बार व्यक्त हुआ हैµ
‘कवि’ कविता की पंक्तियां हैµवो जो दूर सड़क पर खींच रहा है/लदा हुआ ठेला/बहा रहा पसीना और लगा रहा जोर/वह कह रहा है/श्रम की कविता। यहां निराला की एक प्रसिद्ध कविता याद आती हैµमानव जहां बैल घोड़ा है/कैसा तन मन को जोड़ा है।
इसी तरह नागार्जुन की कविता है रिक्शा चालक परµ
खुद गये/दूधिया निगाहों में/फटी बिबाइयों वाले खुरदरे पैर/धंस गये/कुसुम-कोमल मन में/गुट्ठल घट्ठों वाले पैर/दे रहे थे गति/रबड़-विहीन ठूंठ पैडलों को/चला रहे थे/एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्र...।
श्रम-सौंदर्य प्रेरित संदीप की ये कविताएँ हिंदी की इसी मुख्यधारा की कविताएँ हैं। संदीप की एक और कविता हैµ‘देखता रहता हूँ’
थके कदमों से/धीरे-धीरे मेरी गली के सिरे पर/कचरे के ढेर में/न जाने क्या ढूंढते रहे हैं उसके हाथ/मां बच्चा ढूंढ रहे हैं/अपना सहारा उस बदबू के ढेर में/उसका भी कोई भविष्य है/मैं देखता हूं उसे/छोटा पाता हूं/अपने को।
किसी कवि को तथा इन्सान को भी मानवीय की यह उच्चतम सीमा है। इसी तरह ‘हम नहीं लिखते कविता’ में संदीप फिर श्रम से कविता को जोड़ते हैंµ
हाथ ही कविता लिखते हैं/हाथ ही रसोई बनाते हैंµयानि कविता कठिन श्रम से उपजती है।
लेकिन जीवन में हमारे ज्यों-ज्यों सुख सुविधाएँ बढ़ती हैं, हम उसके स्वाद में अधिक लिप्त होते हैं। पर उसी अनुपात में कविता में सहजता, सरसता तथा संप्रेषणीयता गायब होती जाती है। महत्वपूर्ण बात है कवि यहाँ कविता को कवि के आचरण से जोड़कर देखता है। संकेत है जैसी कविता हम रच पाते हैं वैसा जीवन में भी चरितार्थ करके दिखायें। यह बड़ी बात है जिससे आज के बड़े-बड़े कवि कतराते हैं। उनके अनुसार कवि का जीवन और कविता को मिलाकर देखना उचित नहीं। इस तरह कवि स्वैरता के लिये भारी छूट लेकर जीवन के नैतिक मूल्यों को एक तरफ ढकेल देता है।
संदीप की कविताओं के विषय विविध है। उनका अनुभव बहुरंगीय है। उन्होंने अविवाहित स्त्रिायों तथा नेत्राहीनों जैसे विरल विषयों पर कविताएँ लिखी हैं। यहाँ जीवन की विडंबनाएँ और मार्मिक त्रासदियां व्यक्त हुई हैं। इस विविधता से इन कविताओं का फलक चैड़ा हुआ है। सर्वहारा के पक्षधर कवि को जीवन के समग्र पहलुओं को दिखाना ही उचित है। संदीप की भाषा बहुत सहज है। कहीं कोई न तो शब्द चमत्कार है न कृत्रिम दुरूहता। कविता जैसे हमसे संवाद कर रही हो। कवि पृष्ठभूमि में तटस्थ बैठा इस संसार की महामाया का नाटक देखता हो।     

मूल्‍य - 200/-                            
                             
                                   
                                       

Abhi Ummeed Baki Hai by Sundeep Awasthi

ISBN : 978-93-80470-05-4
अभी उम्‍मीद बाकी है लेखक संदीप अवस्‍थी

अधिकांश कहानियां घटना प्रधान या भावना और विचार प्रधान होती हैं। घटना प्रधान कहानी दीर्घजीवी नहीं होती लेकिन उसे पढ़कर आत्मसात करने वाले पाठकों की संख्या अधिक होती है। भावना और विचार का समावेश कहानी की उम्र लम्बी करने के साथ पढ़ने वालों की विकास यात्रा में सहायक बनता है। पात्रों और परिस्थितियों, वेश और परिवेश, दिल और दिमाग के साथ रखते हुए संतुलित बलाघात के माध्यम से किया गया कहानी लेखन बहुधा कालजीवी सिद्ध होता है। लेखक की अपनी तैयारी कहानी की दिशा तय करने के संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक तत्व है। पाठक ने रचना को समय गुजारने के लिये पढ़ा है या पढ़ा हुआ उसमें आये परिवर्तन का कारण बना है, लेखन की सार्थकता की यह सबसे बड़ी कसौटी है।
डा. संदीप अवस्थी के कहानी संग्रह ‘अभी उम्मीद बाकी है’ में शामिल सभी सोलह कहानियाँ वैचारिक परिपक्वता का प्रतिफल हैं। घटना प्रधान होते हुए भी भावना व विचार को साथ रखकर कहानी का गठन किया गया है। दिल का पलड़ा भारी रहने के बावजूद संग्रह की प्रत्येक कहानी एक तेवर को साथ लेकर चलती है। पठन, अध्यवसाय व चिन्तन के साथ चर्चाओं के माध्यम से मंथन करते हुए डा. संदीप ने जो मुकाम हासिल किया है, उसी का नतीजा है कि उनकी कहानियाँ पाठक में निरंतर कुछ न कुछ जोड़ती है। मनोरंजन के लिये पढ़ी गई कहानियाँ भी शनैः-शनैः पैठ बनाती हुई पाठक के चिन्तन को, उसके सोच व संस्कार को उद्वेलन की राह से कदम-दर-कदम आगे बढ़ाते हुए परिवर्तनकामी की भूमिका में लाकर खड़ा कर देती हैं।
‘सरहद के पार’ में सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी व्यापार की, ‘वायवा’ में पी-एच.डी. के दौरान सम्पूर्ण प्रक्रिया की, ‘इमोशनल अत्याचार’ में सम्बन्धों की ईमानदारी परखने के लिये स्टिंग आपरेशन की, ‘मुझसे बुरा न कोय’ में साहित्य जगत की अन्तर्कथा को उजागर करते हुए डाॅ. संदीप अपनी कहानियों से पाठक के लिए वे द्वार और खिड़कियाँ खोलते हैं, जिन तक पहुंचने की चेष्टा कम लेखकों ने की है। जानकारी के नये सूत्रों के साथ वे सड़ांध मारते व्यवस्था के हिस्सों का मुकाबला करने के लिये भी सचेत करते हैं।
‘अभी उम्मीद बाकी है’ और ‘मेरे सीने में आग जलती है’ आतंकवाद की समस्या को भिन्न नजरिये से देखने की चेष्टा करती है। ‘गंगा स्नान’, ‘दिल तो बच्चा है जी’ और ‘संगुफन’ अलग-अलग कथ्यों को लेकर लिखी गई हैं। ये कहानियां समस्या को मनोवैज्ञानिक परिणति प्रदान करती हैं और इस अर्थ में मानव मन केा समझकर उसे सकारात्मक दिशा देने की सार्थक कोशिश हैं। दलित चेतना बनाम दलितों के लिये बने कानूनों के अनुचित प्रयोग पर आधारित कहानी ‘अथातो दलित चेतना’ सत्य के उस पक्ष को उद्घाटित करती है जिसे सामने लाने का साहस सामान्यतः कोई नहीं करता। शारीरिक उबालों में डूबी, आंखें बन्द करके भी वातावरण में रची-बसी होने का अहसास कराती स्थितियों का प्रेम के आवरण में प्रदूषण भरी हवा के सांस लेने को उहापोह चित्रित करती कहानी ”उत्तर आधुनिकतावादी प्रेम“ सांस्कृतिक टकराव का दस्तावेज है।
संग्रह की कहानियां व्यक्तिगत जीवन में व्याप्त दुख-सुख, राग-रंग, उतार-चढ़ाव और आकर्षण-विकर्षण की पृष्ठभूमि के बावजूद सीधी सामाजिक सरोकारों की प्रस्तुति हैं। केवल समस्या बयान करके, चारों ओर दिखाई देती विपरीतताओं की ओर संकेत करके, विवशता भाव प्रदर्शित करके कहानियां चुप नहीं हो जाती हैं। जूझने, संघर्ष करने और समस्या पर काबिज होने का जज्बा संग्रह की कहानियों में शब्द-दर-शब्द परिलक्षित होता है। डा संदीप की एक भी कहानी पलायन का पैगाम लेकर नहीं आती। उनकी कहानियां लड़ते-लड़ते दूर तक जाने की प्रेरणा देती हैं। घोषित करती है कि तब तक हथियार मत डालो कि जब तक समस्या पिघलकर पानी न बन जाये।
डा संदीप को साहित्य की कई मंजिलें अभी तय करनी हैं। मुझे विश्वास है कि विचार व भावपदों उनकी कहानियों में समय को साक्षी बनाता रहेगा संतुलन की जो क्षमता उनकी कहानियों में प्रखर रूप से विद्यमान है, कालान्तर में अधिक पुष्ट होकर सामने आयेगी।
मूल्‍य : 200/-

Thursday, April 21, 2011

उजाले का अंधेरा (कविता संग्रह) लेखक मुकुल सरल


ISBN : 978-93-80470-08-5
उजाले का अंधेरा लेखक मुकुल सरल

आज से लगभग चालीस-पैंतालीस वर्ष पहले, जब नयी कविता के घटाटोप और अकविता की विचारशून्य अराजकता से बाहर आकर हिन्दी कविता ने अपनी पुरानी प्रतिज्ञाओं को नये सिरे से परिभाषित किया था तब से वह वादों और दायरों की गिरोहबन्दियों से निकल कर इन्हीं प्रतिज्ञाओं के बल पर अपनी परख कराती आयी है. ये प्रतिज्ञाएं क्या थीं? दमन और उत्पीड़न के खिलाफ मनुष्य के अथक संघर्ष में साझेदारी, यथास्थिति से कभी समझौता न करने का संकल्प, सत्ता और उसके प्रलोभनों से किनाराकशी और वास्तविकता को पहचानने और उसे व्यक्त करने का आत्मसंघर्ष. चूंकि हिन्दी का जन्म और विकास ही वंचितों की वाणी और दीन-दलितों की आवाज़ के तौर पर हुआ है, इसलिए हिन्दी कविता की जिन प्रतिज्ञाओं का जि़क्र ऊपर किया गया, वे अपने आप में एक कसौटी बन जाती हैं. यह ठीक है कि जैसे-जैसे हमारे देश में और विशेष रूप से हिन्दी पट्टी में सांस्कृतिक संकट बढ़ा है, साहित्यकार सनद, पुरस्कार और सत्ता के दूसरे ताम-झाम की तरफ़ आकर्षित हो कर इन प्रतिज्ञाओं से दूर गये हैं या इन प्रतिज्ञाओं को ही निरर्थक बता कर किन्हीं ‘शाश्वत’ मूल्यों की तलाश करने लगे हैं, हिन्दी कवियों का एक बड़ा तबक़ा विपथगामी हुआ है. ऐसे में मुकुल सरल जैसे कवि हमें ढाढ़स बंधाते हैं कि साठ के दशक के अन्त में और नक्सलबाड़ी के महान उभार से जो चेतना जन्मी थी, जिसने हमें अपनी पुरानी जुझारू परम्परा से जोड़कर हमें ऊपर बतायी गयी प्रतिज्ञाओं को फिर से अपने घोषणा-पत्रा के रूप में सामने रखने की सलाहियत दी थी, वह ग़लत नहीं थी. 
      अन्त में इतना ज़रूर कहना चाहता हूं कि यह मुकुल सरल का पहला कविता संग्रह है. इसमें अभी कुछ अनगढ़ता भी नज़र आ सकती है. इतना ही नहीं, सभी नये लिखने वालों की तरह वे अभी कई तरह के सुरों को आज़मा कर अपना ख़ास अन्दाज़ हासिल करने की कोशिश में जुटे हुए हैं. हमें उम्मीद करनी चाहिये कि वे अपनी ‘करत’ से इस सुर को साधने में सफल होंगे और उनकी पहली-पहली कविताओं से जो आशाएं बंधती हैं उन्हें अगले मुक़ाम तक पहुंचायेंगे. -नीलाभ
मूल्‍य - 190/- रूपये

Tuesday, March 15, 2011

बतकही


ISBN : 978-93-80470-07-8 
बतकही सम्‍पादक भारतेन्‍दु मिश्र

डीयरपार्क दिलशाद गार्डन मे दि.16-2-11 को हिन्दी के जाने माने आलोचक और वरिष्ठ साहित्यकार डाँ.विश्वनाथ त्रिपाठी का 80वाँ जन्मदिन मनाया गया। पार्क के खुले आँगन मे जहाँ वे रोज सुबह सैर करते हैं वहीं के कुछ लेखक और पत्रकार मित्रो के सहयोग से यह समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर डीयरपार्क के मित्रो के सहयोग से प्रकाशित बतकही शीर्षक पुस्तक का उन्हे समर्पण किया गया। इस पुस्तक का सम्पादन भारतेन्दु मिश्र ने किया। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा- मै यहाँ बीस वर्षो से आ रहा हूँ ,यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसीलिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नही हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है।कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है।
समारोह का संचालन लखनऊ से पधारे डियरपार्क के पुराने साथी और पत्रकार विभांशु दिव्याल ने किया। संचालन करते हुए उन्होने - बतकही को साहित्य मे अपनी तरह की पहली किताब बताया जिसमे साहित्यकारो की गप्प को लिपिबद्ध किया गया है। इस अवसर पर अन्य वक्ताओ मे बलराम अग्रवाल, अशोक गुजराती, भारतेन्दु मिश्र, रमेश प्रजापति, जयकृष्ण सिंह आदि ने त्रिपाठी जी को स्वस्थ और दीर्घायु होने की शुभकामनाएँ दीं। इसके साथ ही समारोह मे सुश्री काजल पाण्डेय, हरिनारायण, रमेश आजाद, अंगद तिवारी, राम कुमार कृषक, जयशंकर शुक्ल, वरिष्ठ नागरिक अवतार सिंह सहित अनेक मित्रो ने भाग लिया।
पुस्‍तक का मूल्‍य - 125 रूपये

Wednesday, November 17, 2010

दूर होते रिश्‍ते लेखक राजेन्‍द्र परदेसी

ISBN : 978-93-80470-04-7

दूर होते रिश्‍ते
लेखक राजेन्‍द्र परदेसी

आधुनिक समाज में विघटनवादी प्रव़तियों का प्रापल्‍य है  परिणामतः रिश्‍तें जो समाज को जोडे रखते हैं दूर होते जा रहे है ये सभी दूरी सभी रिश्‍तों में होती जा रही है पिता-पुत्र, मां-बेटा, पति-पत्‍नी, भाई-बहन आदि रिश्‍तों में दूरियां आधुनिकता की नियति है संपन्‍न‍  परिवार स्‍वार्थों के टकराव से विखंडित होते जा रहे है यह .त्रासदी है इसे झेलते हुए भी लोग महसूस नहीं कर पा रहे है उन्‍हें रिश्‍तों की दूरी में आनंद की ही अनुभूति प्रतीत हो रही है
       कथाकार राजेन्‍द्र परदेसी ने रिश्‍तों के बीच बढती दूरी का अनुभव बडी शिद्दत से किया है उन्‍होंने सामाजिक जीवन के इस बिखराव का अपनी कहानियों को केन्‍द्र में रखकर उन्‍हें सोददेश्‍यपरकता से सवारा है जिसकी मार्मिकता से पाठक के मन में यथार्थ का बोध होगा और वह कहानियों से प्रभावित होगा.
मूल्‍य - 150 रूपये

Sunday, September 26, 2010

कविता का समय संपादक लीलाधर मंडलोई

ISBN : 978-93-80470-03-0

कविता का समय
संपादक - लीलाधर मंडलोई

कविता की इस छोटी सी दुनिया में प्रवेश के रास्‍ते हैं लेकिन कुछ उलझे हुए हैं गांव-खेडे का कवि अक्‍सर भटक जाता है प्रकाशक ने इस प्रकाशन दायित्व से इस दुनिया को थोडा चौडा किया है और अब एक स्पेस है इस पर आते कवि हैं उनकी अपनी एक जगह होगी जहां से वे दुनिया को समझ सकेंगे उनके संघर्ष बडे होगे मुमकिन है कठिन रास्तों से बडी कविता के लिए कोई रास्ता खुले हमने तो उसके लिए एक जगह बनाई है अब यह जगह है और कवि है और रास्ता है और सबसे अच्छी लिखी जाने वाली कविता की उम्मीद....
पुस्तक का मूल्य : 200 रूपये
प्रकाशक : कश्यप पब्लिकेशन

Thursday, June 10, 2010

DEVELOPMENT OF PRIMITIVE TRIBES IN INDIA by Dr. CHANDRAKANT PURI

DEVELOPMENT OF PRIMITIVE TRIBES IN INDIA by Dr. CHANDRAKANT PURI ISBN : 978-81-905501-92
As per the 2001 Census there were 85.77 lakh tribals in Maharashtra, which is 8.85% of the total population of Maharashtra. Bhill, Gond, Gavit, Kolam, Kokru, Warli, Kokna, Andh, Malhar, koli, Thakur and Katkaris are the predominant tribes in Maharashtra which constitute 80% of the total tribal population.17 Maharashtra is one of the four states, which has the largest number of tribal population. According to the 2001 Census, the literacy in Maharashtra was 76.90% whereas the literacy among the tribals was just 45.05%. All the tribal communities in Maharashtra are economically impoverished. The main source of their livelihood is agriculture. Forty percent of the tribals cultivate land, whereas 45% of them work as agricultural laborers. Besides agriculture, another major source of their livelihood is forest products. Tribals in Maharashtra can be geographically divided into 3 areas namely, Sahyadri region, Satpuda region and Gondvan region. As per 2001 census tribal population of the Raigad district is 12.2%, which falls under the sahyadri region.

Rs. 250/-

Publisher : Kashyap Publication Adress : B-48/UG-4, Dilshad Exten-II, DLF, Ghaziabad-201005 ph: 9868778438

Wednesday, June 9, 2010

Garun Puran Rahashya

ISBN: 978-93-80470-01-6
गरुड़ पुराण रहस्य
लेखक
परम दयाल फकीर चंद जी महाराज
फकीर के धार्मिक विचारों के कई स्रोत थे जैसे हिंदू धर्म (सनातन धर्म) और राधास्वामी मत से उनकी लंबी सहबद्धता और सब से बढ़ कर सुरत शब्द योग में उनका निजी अनुभव. फकीर को राधास्वामी मत के मानवतावादी नजरिए में सहमति योग्य बहुत कुछ मिला लेकिन वे उनके नामदान के परंपरागत तरीके और भारत में प्रचलित गुरुइज़्म से असहमत थे. ऐसी धार्मिक प्रथाओं के प्रति उनकी सहनशीलता शून्य थी जिनसे गरीब, विश्वासी और भोले-भाले लोगों का शोषण होता हो. वे कबीर द्वारा चलाए गए संतमत के बुनियादी सिद्धांतों के प्रबल हिमायती थे परंतु सुरत शब्द योग की उच्चतम अवस्थाओं के अंतिम परिणाम और संतों द्वारा पोषित रहस्यवाद से उनका मोहभंग हो चुका था. बाद में उन्होंने योग-साधना को दिए जा रहे महत्व को कम किया और संतमत के मानवतावाद पर बल दिया. फकीर की इस विचार में आस्था थी कि 'सेक्स केवल संतान उत्पत्ति के लिए हो' (यहाँ वांछित संतान अभिप्रेत है). बिना संतान की इच्छा के पैदा हुई संतान को वे ख़ुद रौ संतान कहा करते थे जो देश के लिए हानिकारक है. संतान को संतान प्राप्ति के भाव से उत्पन्न करने पर वे बल देते थे. इससे मानव जाति के कष्ट कम हो सकते हैं. उनके जीवन-दर्शन के अनुसार दूसरों के और अपने कल्याण की इच्छा करना जीवन के प्रति आशावादी दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है. युवाओं को आंतरिक शांति के लिए उन्होंने शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करने, सदा व्यस्त रहने, अपनी आजीविका स्वयं कमाने, किसी सच्चे इंसान के मार्गदर्शन में रहने और आत्म-संयमी बनने की सलाह दी. अपने सामाजिक कर्तव्य के तौर पर उन्होंने अनुयायियों से कहा कि वे दूसरों को नीयतन कष्ट न पहुँचाएँ, बेमतलब बात करने से बचें, कड़वे शब्दों के प्रति सहनशील बनें और साथी प्राणियों की नि:स्वार्थ सेवा करें फकीर ने 'हर कीमत पर घरेलू शांति' पर विशेष बल दिया. शुभ कर्म, शुद्ध कमाई, दान (जिसमें प्रेम और कल्याण भी शामिल है) आदि जीवन के ऐसे पक्ष थे जो आध्यात्मिक और सामाजिक दायित्व में शामिल थे. ये मानव मात्र के लिए आवश्यक हैं. आध्यात्मिक साधनाओं के अंतर्गत उन्होंने प्रेम, भक्ति, विश्वास, समर्पण पर ज़ोर दिया. 'स्वयं के प्रति सच्चा बनने', ईश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करने, सुमिरन-ध्यान करने और इस प्रकार अंत में आत्मज्ञान प्राप्त करने का तरीका उन्होंने बताया. फकीर चंद जी महाराज ने इस बात पर हमेशा बल दिया कि स्त्रियों का गुरु स्त्री को ही होना चाहिए. यह महिलाओं के सामाजिक सम्मान के लिए ज़रूरी है. फकीर ने अनुभव किया कि इन्सान चेतन तत्त्व का बुलबुला है और कि संतों का और मानव का अंतिम लक्ष्य (मंज़िले मकसूद) शांति है.

Tuesday, May 11, 2010

Galti Sudhar Gayee by Jagmohan Azad

Galti Sudhar Gayee by Jagmohan Azad ISBN:978-93-80470-02-3 Review Text : आज़ाद की इन बाल कहानियों में गढ़वाल और कुमाऊं की पथरीली जमीन का अहसास है, वहां के स्कूलों की खामियां-खूबियां भी तो बच्चों के दर्द की अपनी अभिव्यक्ति भी है। इन कहानियों में कई कहानियां मुक्तिकामी चेतना को आवाज़ देने वाली तो है साथ सहज सरल भाषा में बच्चों की सहज सरल कहानियां भी हैं। जिनकी आज के बच्चों को जरूरत है। आज के बच्चे कम्प्यूटर गेम और 'ई' तकनीकी के जिस तरह से दिवाने हो रहे है। ऐसे में गांव-खेत-खलिहाना और दादा-दादी के समय से बच्चों के लिए संस्कार-आदर्श निकालकर इनके सामने रखना जितना चुनौती पूर्ण हैं,यह आज किसी से छुपा नहीं हैं। लेकिन जगमोहन ने अपने पहले बाल काहनी संग्रह 'गलती सुधर गयी' के माध्यम से जिस तरह से इस चुनौती को स्वीकार किया हैं। इसकी निश्चित तौर पर प्रसन्नसा की जानी चाहिए। क्योंकि इन संस्कारों और आदर्शों की आज के बच्चों को बहुत जरूरत हैं।
मूल्य : 80 रूपये
प्रकाशक : कश्यप पब्लिकेशन
बी-48/यू. जी.-4, दिलशाद एक्‍सटेंशन-2 डीएलएफ, गाजियाबाद-05
फोन: 9868778438

Friday, May 7, 2010

santmat by bhagat munshiram

Title: Santmat by bhagat munshiram ISBN: 8190550144 Review Text: "बचपन से ही संत और संतमत जैसे शब्‍द अपनी अलग-अलग छवियों के साथ मन पर बैठतेरहे हैं. संतमत की एक छवि रहस्‍य जैसी भी है जिसे जाना नहीं जा सकता. एक अलौकिकप्रभामंडल जैसी भी है जो लुभाता तो है परन्‍तु उस तक पहुँचना कठिन है. कोईबेपरवाह तेजस्‍वी है जो हर हाल में मस्‍त है. कहीं साधुओं या सत्‍संगियों कीभीड़ पर हवा-सा पसरा बैठा है. कहीं सुधारक, कहीं उद्धारक, कहीं कष्‍ट निवारक, कहींमनोकामना पूरी करने वाला. कहीं किसी धर्मगुरु की मूर्ति, कहीं किसी महात्‍मा काफोटो. इन छवियों का कोई अन्‍त नहीं और सब के सब लडाइयों के धन्‍धे......" प्रकाशक कश्यप पब्लिकेशन बी-48/ यूजी-4, दिलशाद एक्‍टेंशन-II डीएलएफ, गाजियाबाद फोन 09868778438

Friday, April 23, 2010

शास्‍त्रार्थ

रंग लेखन और रंगचर्चा की दष्टि से देखें तो हिन्‍दी नाटकों में विभिन्‍न प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं ये प्रयोग सामयिक और सनातन प्रश्‍नों से मुठभेड करते हुए अपनी सार्थकता सिध्‍द करते हैं अब यह चिन्‍ता कुछ कम हो रही है कि हिन्‍दी में मौलिक नाट्रयलेखों का अभाव है वस्‍तुत पिछले दो दशकों में नाट्रयलेखकों और नाट्रय निर्देशकों ने अपनी स‍िक्रियता से हिन्‍दी रंगकर्म को और भास्‍वर किया है शास्‍त्रार्थ इसी कडी में एक मौलिक नाटय रचना है आचार्य शंकर और मंडन मिश्र का शास्‍त्रार्थ बहुविदित है मंडन मिश्र की पत्‍नी शारदा का हस्‍तक्षेप और अमरूक के शरीर में शंकर का परकाया प्रवेश ये ऐसे प्रसंग है जो पाठकों को रोमांचित करते रहे हैं शास्‍त्रार्थ नाटक इसी कथाभूमि पर विकसित है तीन अंकों और दस दरष्‍यों में सुसंयोजित यह रचना रंगमंच के लिए एक नवीन आकर्षण सिध्‍द होगी भारतेन्‍दु मिश्र संस्‍करत साहित्‍य के अध्‍येता है इसलिए शास्‍त्रार्थ में गूढ चिन्‍तन का सहज समावेश हो गया है
पुस्‍तक
शास्‍त्रार्थ
लेखक
भारतेन्‍दु मिश्र
प्रकाशक
कश्‍यप पब्लिकेशन

Nai Roshni: Author: Bhartendu Mishra, ISBN: 8190550187 - A1Books India

Nai Roshni: Author: Bhartendu Mishra, ISBN: 8190550187 - A1Books India